Bihar Land Scam: बिहार में जमीन से जुड़े कथित फर्जीवाड़े और संगठित भू-माफिया के नेटवर्क को लेकर जांच एजेंसियों की पड़ताल तेज हो गई है। जांच में कई अंचलों में जमीन माफिया और राजस्व विभाग से जुड़े कुछ अधिकारियों-कर्मचारियों के बीच कथित सांठगांठ के संकेत मिलने की बात सामने आई है। आरोप है कि फर्जी दस्तावेज तैयार करने से लेकर जमीन की रजिस्ट्री और फिर दाखिल-खारिज तक की प्रक्रिया के जरिए जमीन पर दावा मजबूत करने की कोशिश की जाती थी। आर्थिक अपराध इकाई (EOU) समेत अन्य जांच एजेंसियां अब इस कथित नेटवर्क की अलग-अलग कड़ियों की जांच कर रही हैं। जानकारी के मुताबिक राज्य के 18 अंचलों में उच्चस्तरीय जांच चल रही है, जबकि करीब एक दर्जन अंचलों में संदिग्ध गतिविधियों को लेकर कार्रवाई की अनुशंसा भी की गई है।
सरकारी जमीन से निजी संपत्तियों तक निशाने पर होने का आरोप
जांच में यह बात सामने आने का दावा किया गया है कि कथित भू-माफिया केवल सरकारी जमीन तक सीमित नहीं हैं। कमजोर और असहाय लोगों की निजी जमीनों को भी निशाना बनाए जाने की शिकायतें जांच एजेंसियों तक पहुंची हैं। आरोप है कि जमीन पर कब्जे की प्रक्रिया कई चरणों में आगे बढ़ाई जाती थी। पहले पुराने या कथित फर्जी दस्तावेज तैयार किए जाते, इसके बाद उनके आधार पर रजिस्ट्री कराने की कोशिश होती और फिर राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराने के लिए दाखिल-खारिज की प्रक्रिया अपनाई जाती। यदि जांच में इन आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह मामला केवल जमीन विवाद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राजस्व रिकॉर्ड की प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं का भी बड़ा मामला बन सकता है।
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इन इलाकों में सामने आए कथित गठजोड़ के संकेत
जांच एजेंसियों की पड़ताल में कई अंचलों का नाम सामने आने की बात कही गई है। इनमें शामिल हैं:
- जमुई का सिकंदरा
- पटना का बख्तियारपुर
- पटना का खुसरूपुर
- पटना का नौबतपुर
- मुजफ्फरपुर का मुसहरी
इसके अलावा अन्य अंचलों में भी इसी तरह की शिकायतों और संदिग्ध गतिविधियों की जांच की जा रही है। संबंधित विभाग को कुछ मामलों में कार्रवाई की अनुशंसा किए जाने की जानकारी भी सामने आई है।
80-100 साल पुराने दस्तावेजों के नाम पर फर्जीवाड़े का आरोप
जांच में कथित फर्जीवाड़े का जो तरीका सामने आया है, वह काफी पुराना और जटिल बताया जा रहा है। आरोप है कि किसी जमीन को विवादित दिखाने के लिए दशकों पुराने दस्तावेजों का सहारा लिया जाता था। कई मामलों में 80 से 100 साल पुराने बताए जाने वाले केवाला या अन्य कागजात इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई है। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि ऐसे दस्तावेज वास्तविक हैं या इन्हें बाद में तैयार किया गया। इसके बाद कथित तौर पर जमीन की रजिस्ट्री गिरोह से जुड़े अलग-अलग लोगों के नाम पर कराने की प्रक्रिया शुरू होती थी।
रजिस्ट्री के बाद दाखिल-खारिज का खेल?
जमीन की रजिस्ट्री के बाद राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराना इस कथित नेटवर्क का अगला चरण बताया जा रहा है। आरोप है कि कुछ मामलों में संबंधित राजस्व अधिकारियों या कर्मचारियों की मदद से रिपोर्ट तैयार कराई गई और उसके आधार पर दाखिल-खारिज कराया गया। दाखिल-खारिज के बाद राजस्व रिकॉर्ड में नया नाम दर्ज हो जाने से जमीन पर दावा मजबूत करने की कोशिश की जाती थी। यही वजह है कि जांच एजेंसियां अब केवल रजिस्ट्री दस्तावेजों की जांच नहीं कर रही हैं, बल्कि दाखिल-खारिज से जुड़े रिकॉर्ड और अधिकारियों की भूमिका भी देख रही हैं।
शिकायतों के बावजूद कार्रवाई में देरी का भी आरोप
जमीन के वास्तविक दावेदारों की ओर से अधिकारियों के पास शिकायत किए जाने की बात भी सामने आई है। बताया गया है कि कई लोग अपनी जमीन को लेकर पहले अंचलाधिकारी के पास पहुंचे और इसके बाद डीसीएलआर तथा अपर समाहर्ता स्तर पर भी शिकायत की। हालांकि, कुछ मामलों में शिकायतों के लंबे समय तक लंबित रहने का आरोप लगाया गया है। जांच एजेंसियां अब यह भी देख रही हैं कि शिकायत मिलने के बाद संबंधित अधिकारियों ने क्या कार्रवाई की और यदि कार्रवाई नहीं हुई तो उसकी वजह क्या थी।
18 अंचलों में चल रही उच्चस्तरीय जांच
जांच एजेंसियां फिलहाल राज्य के 18 अंचलों में सामने आए जमीन से जुड़े मामलों की उच्चस्तरीय जांच कर रही हैं। इसका उद्देश्य अलग-अलग मामलों के बीच किसी संगठित नेटवर्क या समान तरीके की मौजूदगी का पता लगाना है। EOU और अन्य एजेंसियां कथित फर्जी दस्तावेज से लेकर रजिस्ट्री और दाखिल-खारिज तक की पूरी प्रक्रिया को जोड़कर देख रही हैं। जांच में दस्तावेज तैयार करने वाले लोगों, जमीन की रजिस्ट्री कराने वालों और राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव से जुड़े लोगों की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
जांच पूरी होने के बाद हो सकता है बड़ा एक्शन
फिलहाल सामने आए आरोपों की जांच जारी है। जांच एजेंसियां दस्तावेजों और रिकॉर्ड की पड़ताल के साथ संबंधित लोगों की भूमिका भी खंगाल रही हैं। यदि जांच में आरोप प्रमाणित होते हैं, तो जमीन माफिया के साथ-साथ सरकारी तंत्र में कथित तौर पर शामिल लोगों पर भी कार्रवाई की संभावना बन सकती है। बिहार में जमीन से जुड़े विवाद पहले से ही बड़ी संख्या में सामने आते रहे हैं। ऐसे में इस जांच का नतीजा यह तय करने में महत्वपूर्ण हो सकता है कि सरकारी और निजी जमीन के रिकॉर्ड में कथित फर्जीवाड़े को रोकने के लिए आगे क्या कदम उठाए जाते हैं। फिलहाल जांच एजेंसियों की अगली कार्रवाई पर नजर है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कथित नेटवर्क में कौन-कौन लोग शामिल थे और उनकी भूमिका क्या थी।




