मुकेश रंजन
Ranchi : रामनवमी केवल पर्व नहीं, आस्था की पुनरावृत्ति है।” इस पावन अवसर पर सुकुरहुटू पूरे देश के आस्था और परंपरा का जीवंत उदाहरण यह संदेश देता है कि जहाँ भक्ति है, वहाँ रास्ता है—और जहाँ श्रीराम हैं, वहाँ जीवन है। भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव रामनवमी के पावन अवसर पर जहां पूरे देश में श्रद्धा और उल्लास की लहर है। वहीं झारखंड के सुकुरहुटू गाँव में भी यह पर्व पूरी भव्यता और परंपरा के साथ मनाया जा रहा है। अयोध्या के बाद सुकुरहुटू वह स्थान है। जहां श्री रामजन्म महोत्सव की 107वीं वर्षगांठ श्रद्धा, भव्यता और गहराई से जुड़ी आस्था के साथ मनाई जा रही है। यह महोत्सव सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक चमत्कार की याद भी है। जिसने पूरे गाँव को मृत्यु के कगार से जीवन की ओर लौटा दिया।

रामनवमी का महत्व
रामनवमी हिन्दू धर्म का एक प्रमुख पर्व है, जो चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाया जाता है। यह भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव का प्रतीक है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान राम का जन्म अयोध्या में दोपहर 12 बजे हुआ था। इस दिन घरों और मंदिरों में विशेष पूजा, भजन-कीर्तन, रामायण व रामचरितमानस का पाठ किया जाता है और ठीक 12 बजे शंखनाद।
रामलला के स्वागत में सजी सुकुरहुटू की गलियाँ
सुकुरहुटू गाँव की गलियाँ आज फिर राम नाम के जयघोष से गूंज उठीं। रामलला की स्वर्ण प्रतिमा को भव्य शोभायात्रा के साथ डोले में सवार कर गाँव भ्रमण कराया जाता है। सैकड़ों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में इस धार्मिक यात्रा ने एक भावनात्मक और आध्यात्मिक माहौल उत्पन्न हो जाता ।
ठीक 12 बजे हुआ राम जन्म
साहू मुहल्ला स्थित राम जन्म स्थल पर जैसे ही दोपहर 12 बजे का समय हुआ, भक्तों ने जय श्रीराम के नारों के साथ श्रीराम के जन्म का उल्लास मनाया। महावीर झंडा गाड़ने की परंपरा का पालन करते हुए, पूरे गाँव में आस्था का रंग चढ़ गया।
छ: दिन तक चलेगा पर्व, डोल मेला भी आकर्षण का केंद्र
रामनवमी के अगले दिन डोल मेला का आयोजन होता है, जो सुकुरहुटू की पहचान बन चुका है। रामलला के भ्रमण के बाद यह मेला श्रद्धालुओं और ग्रामीणों के लिए उत्सव का एक अनूठा अवसर बनता है। छः दिनों तक पूजा, हवन और भक्ति कार्यक्रमों का आयोजन होता है। अंतिम दिन, रामलला को पुनः मंदिर में विश्राम के लिए स्थापित किया जाएगा।
आस्था और परंपरा का जीवंत उदाहरण
107 वर्षों पूर्व हैजा जैसी महामारी से उबरे इस गाँव में रामनवमी पर्व की शुरुआत अयोध्या से आए साधुओं ने की थी। आज यह आयोजन पूरे क्षेत्र के लिए एक मिसाल बन गया है—जहाँ भक्ति, एकता और विरासत एक साथ जीवित हैं। सन् 1917 में सुकुरहुटू गाँव हैजा महामारी की चपेट में था। हर दिन सैकड़ों लोगों की मृत्यु हो रही थी। गाँव में भय और हताशा का वातावरण था। तभी अयोध्या से कुछ साधु-संतों का आगमन हुआ। उन्होंने गाँव की पीड़ा देखकर साहू मुहल्ला में श्रीकृष्ण मंदिर का निर्माण करवाया और अगले वर्ष 1918 में रामनवमी के दिन श्री रामजन्म महोत्सव की शुरुआत की। रामलला की स्वर्ण प्रतिमा को डोले में बैठाकर गाँव भ्रमण कराया गया। चमत्कारिक रूप से इसके बाद महामारी शांत हो गई और गाँव में जीवन फिर से मुस्कराने लगा।
परंपरा जो आज भी जीवित है
विगत 107 वर्षों से यह परंपरा जीवित है। आज भी रामलला की स्वर्ण प्रतिमा स्व. रामू दास गोस्वामी जी के घर से लाकर रामजन्म स्थल पर स्थापित की जाती है। ठीक दोपहर 12 बजे श्रीराम जन्म का आयोजन होता है और महावीर झंडा फहराया जाता है। इसके बाद पूरे गाँव में झंडा गाड़ने की परंपरा निभाई जाती है।
डोल मेला: उत्सव का पर्व
रामनवमी के अगले दिन रामलला को भव्य डोले में गाँव का भ्रमण कराया जाता है। इस आयोजन के साथ डोल मेला भी होता है, जो सुकुरहुटू की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान बन गया है। हजारों श्रद्धालु इस आयोजन में भाग लेते हैं।
छ: दिन तक चलता है आयोजन
छह दिनों तक राम जन्मस्थल पर विधिवत पूजा, हवन और भजन-कीर्तन होते हैं। छठी पूजा के दिन रामलला को पुनः रामू दास गोस्वामी जी के घर स्थित मंदिर में स्थापित कर एक वर्ष के विश्राम पर भेजा जाता है।
एक संदेश, एक आस्था
यह महोत्सव केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भक्ति, परंपरा और चमत्कार का जीता-जागता उदाहरण है। सुकुरहुटू आज भी श्रद्धा की उस लौ को जलाए हुए है, जो एक सदी पहले अंधकार में आशा का दीपक बनकर उभरी थी।



