प्रेमजाल या साजिश? आदिवासी बेटियों के नाम पर दोहन, धर्मांतरण और जमीन हड़पने की खौफनाक पटकथा

Ranchi : झारखंड की पावन धरती, जो आदिवासी संस्कृति की शान मानी जाती है, आज असुरक्षा, षड्यंत्र और शोषण की कहानियों से दहक रही है। एक के बाद एक मामलों ने साफ कर दिया है कि आदिवासी बेटियों को प्रेम और प्रथा के नाम पर

प्रेमजाल या साजिश? आदिवासी बेटियों के नाम पर दोहन, धर्मांतरण और जमीन हड़पने की खौफनाक पटकथा

Ranchi : झारखंड की पावन धरती, जो आदिवासी संस्कृति की शान मानी जाती है, आज असुरक्षा, षड्यंत्र और शोषण की कहानियों से दहक रही है। एक के बाद एक मामलों ने साफ कर दिया है कि आदिवासी बेटियों को प्रेम और प्रथा के नाम पर छलने का एक सुनियोजित खेल चल रहा है — जिसमें शिकार बन रही हैं वो मासूम बेटियाँ, जिनकी पहचान, अस्मिता और अधिकार दोनों खतरे में हैं।

आदिवासी नेता संदीप उरांव ने सिस्टम को आईना दिखाते हुए तीखे सवाल किए हैं:

“कभी प्यार का दिखावा, कभी धर्म का प्रलोभन, और फिर ज़मीन पर कब्जा — ये कैसी प्रथा है? ये कौन लोग हैं जो आदिवासी बनकर हमारी संस्कृति को बदनाम और बेटियों को बर्बाद कर रहे हैं?”

उन्होंने कहा कि कुछ बाहरी तत्व न केवल झूठे प्रेम-प्रसंग रचाकर युवतियों का शोषण कर रहे हैं, बल्कि धर्मांतरण के जरिए उन्हें सामाजिक रूप से अलग-थलग कर दोहरी लूट कर रहे हैं — इज़्ज़त भी और ज़मीन भी।

प्रलोभनों, झूठी पहचान और चालाकी से रचा गया यह जाल, अब पूरे आदिवासी समाज में गुस्से और जागरूकता की लहर ला रहा है।

राजनीतिक चुप्पी, प्रशासनिक निष्क्रियता और तथाकथित समाजसेवियों की मौन स्वीकृति अब और बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सवाल अब सिर्फ अन्याय का नहीं, संस्कृति के अस्तित्व का है।

हर गांव, हर चौपाल से अब एक ही आवाज़ उठ रही है —

हमारी बेटियाँ खिलौना नहीं, हमारी संस्कृति कोई प्रयोगशाला नहीं!

सरकार बताए — कब तक खामोश रहेगी ? कब मिलेगा न्याय ?

अब बात सिर्फ इंसाफ की नहीं, आदिवासी अस्तित्व की रक्षा की है।

और ये लड़ाई थमेगी नहीं — जब तक सच्चाई उजागर न हो और हर बहन सुरक्षित न हो।

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