असम में 2.43 लाख नाम वोटर लिस्ट से हटे, जनसांख्यिकी पर सियासी बहस तेज

New Delhi : आगामी विधानसभा चुनाव से पहले निर्वाचन आयोग ने असम की फाइनल मतदाता सूची जारी कर दी है। ड्राफ्ट सूची की तुलना में फाइनल रोल में 2,43,485 नाम कम पाए गए हैं—यानी कुल मतदाताओं में 0.97% की कमी। दिलचस्प बात यह है कि

असम में 2.43 लाख नाम वोटर लिस्ट से हटे, जनसांख्यिकी पर सियासी बहस तेज
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New Delhi : आगामी विधानसभा चुनाव से पहले निर्वाचन आयोग ने असम की फाइनल मतदाता सूची जारी कर दी है। ड्राफ्ट सूची की तुलना में फाइनल रोल में 2,43,485 नाम कम पाए गए हैं—यानी कुल मतदाताओं में 0.97% की कमी। दिलचस्प बात यह है कि जहां कई आदिवासी बहुल इलाकों में मतदाता घटे हैं, वहीं मुस्लिम बहुल जिलों में संख्या बढ़ी है, जिससे डेमोग्राफी को लेकर राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है।

फाइनल वोटर लिस्ट के प्रमुख आंकड़े

  • कुल मतदाता: 2,49,58,139
  • पुरुष: 1,24,82,213
  • महिलाएं: 1,24,75,583
  • थर्ड जेंडर: 343

जिलों का हाल

  • असम के 35 जिलों में से 24 जिलों में मतदाता घटे
  • 10 जिलों में मतदाताओं की संख्या बढ़ी (100 से लेकर 30,000+ तक)

जहां बढ़ोतरी दिखी:
बारपेटा, धुबरी, गोलपाड़ा, मोरीगांव, नगांव, दक्षिण सलमारा, बोंगाईगांव, हैलाकांडी (मुस्लिम बहुल);
माजुली (+209) और बजाली (+1,300) जैसे दो गैर-मुस्लिम जिले।

जहां गिरावट आई:
ऊपरी असम में स्पष्ट कमी—सोनितपुर (–22,186), लखीमपुर (–20,998), गोलाघाट (–20,027), जोरहाट (–11,940)।
प्रतिशत के हिसाब से दरांग (–2.68%) और उदालगुड़ी (–2.76%) में सबसे ज्यादा गिरावट।

जलुकबाड़ी का मामला

मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के जलुकबाड़ी विधानसभा क्षेत्र में 4,300+ नाम हटाए गए। फाइनल सूची में यहां 2,06,314 मतदाता दर्ज हैं, जो ड्राफ्ट सूची से 4,310 कम हैं।

सरकार का पक्ष

मुख्यमंत्री सरमा का कहना है कि बीजेपी कार्यकर्ताओं की शिकायतों के आधार पर विशेष पुनरीक्षण (SIR) में संदिग्ध मतदाताओं के नाम हटाए गए। उन्होंने दावा किया कि 1985 के असम समझौते के बाद पहली बार इतनी बड़ी संख्या में नाम हटे हैं और अवैध प्रवासियों के खिलाफ अभियान जारी रहेगा।

नोट: फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि हटे/जुड़े नाम किस धर्म से संबंधित हैं—यह जानकारी आधिकारिक रूप से सार्वजनिक नहीं की गई है।

निष्कर्ष:
फाइनल वोटर लिस्ट के आंकड़े चुनावी राजनीति में जनसांख्यिकी पर नई बहस छेड़ सकते हैं। बढ़ोतरी और गिरावट का यह पैटर्न आगे राजनीतिक रणनीतियों और बयानबाज़ी का केंद्र बनने की संभावना रखता है।

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