Ranchi: राजधानी रांची में दशहरा पर रावण दहन की परंपरा करीब आठ दशक पुरानी है। वर्ष 1948 में पहली बार यहां रावण के पुतले का दहन किया गया था। उस समय पुतले की ऊंचाई महज 12 फीट थी। धीरे-धीरे यह आयोजन बड़ा होता गया और आज मोरहाबादी मैदान में रावण दहन देखने के लिए हजारों लोग जुटते हैं।
1948 में हुई थी शुरुआत
रांची में पहली बार महात्मा गांधी मार्ग पर रांची कॉलेज के पास स्थित डाकघर के सामने रावण दहन का आयोजन हुआ था। उस समय रावण का पुतला 12 फीट ऊंचा बनाया गया था। इसके बाद हर साल दशहरा पर रावण दहन की परंपरा जारी रही।
शरणार्थी शिविर में तैयार होते थे पुतले
वर्ष 1950 से 1955 के बीच रावण के पुतले रेलवे स्टेशन के पास खजुरिया तालाब स्थित शरणार्थी शिविर में बनाए जाते थे। उस दौर में रावण दहन का आयोजन बारी पार्क में होता था। वर्तमान में इस स्थान पर टाउन हॉल है। बाद में पंजाबी हिंदू बिरादरी के सदस्यों ने डोरंडा स्थित राम मंदिर में रावण के पुतले बनाने शुरू किए।
1960 से मोरहाबादी मैदान में हो रहा रावण दहन
रावण दहन देखने के लिए लोगों की भीड़ बढ़ने लगी, जिसके बाद वर्ष 1960 में आयोजन स्थल बदलकर मोरहाबादी मैदान कर दिया गया। तब से यहां हर साल रावण दहन किया जा रहा है। समय के साथ पुतलों की ऊंचाई बढ़ी और आयोजन भी भव्य होता गया।
रावण के साथ कुंभकर्ण और मेघनाथ के पुतले भी बनेंगे
इस बार मोरहाबादी मैदान में 70 फीट ऊंचे रावण के पुतले का दहन किया जाएगा। इसके अलावा 65 फीट ऊंचा कुंभकर्ण और 60 फीट ऊंचा मेघनाथ का पुतला भी तैयार किया जाएगा। आयोजन को खास बनाने के लिए 30×30 फीट की दो मंजिला सोने की लंका भी बनाई जाएगी। पंजाबी हिंदू बिरादरी की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में हर साल बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं। करीब 78 साल पहले 12 फीट के पुतले से शुरू हुई यह परंपरा आज रांची के प्रमुख दशहरा आयोजनों में शामिल हो चुकी है।




