पटना: महिलाओं और छात्राओं की सुरक्षा को मजबूत करने के उद्देश्य से पटना में शुरू की गई ‘पुलिस दीदी’ व्यवस्था को लेकर अब नई चुनौती सामने आई है। क्षेत्र में जाकर महिलाओं और बच्चियों की समस्याओं की जानकारी लेने, जागरूकता अभियान चलाने और जरूरत पड़ने पर पुलिस सहायता उपलब्ध कराने के लिए महिला पुलिसकर्मियों को स्कूटी उपलब्ध कराई गई थी। लेकिन जानकारी के मुताबिक, करीब 50 फीसदी महिला पुलिसकर्मियों को स्कूटी चलाने में परेशानी हो रही है। इनमें करीब 10 फीसदी ऐसी महिला पुलिसकर्मी भी हैं, जिन्हें दोपहिया वाहन चलाने का अनुभव नहीं है और उनके पास ड्राइविंग लाइसेंस भी नहीं है। ऐसे में थानों तक स्कूटी पहुंचने के बावजूद इनके नियमित फील्ड इस्तेमाल को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
36 थानों को मिलीं 360 स्कूटी
पटना जिले में ‘पुलिस दीदी’ व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए 36 थानों को कुल 360 स्कूटी उपलब्ध कराई गई हैं। प्रत्येक थाने को 10 स्कूटी दी गई हैं। इन वाहनों के जरिए महिला पुलिसकर्मियों को अपने-अपने थाना क्षेत्र में नियमित भ्रमण करने और महिलाओं तथा छात्राओं से जुड़ी समस्याओं की जानकारी लेने की जिम्मेदारी दी गई है। व्यवस्था का उद्देश्य महिला पुलिसकर्मियों की क्षेत्र में पहुंच बढ़ाना है, ताकि महिलाओं और छात्राओं को किसी परेशानी की स्थिति में पुलिस तक पहुंचने के लिए लंबी प्रक्रिया से न गुजरना पड़े। हालांकि, स्कूटी मिलने के बाद इसके इस्तेमाल में व्यावहारिक दिक्कत सामने आ रही है। कुछ महिला पुलिसकर्मियों का कहना है कि उन्हें अभी स्कूटी ठीक से चलाना नहीं आता। वे पहले ड्राइविंग सीखने के बाद नियमित रूप से क्षेत्र में निरीक्षण शुरू करेंगी।
10% महिला पुलिसकर्मियों के पास लाइसेंस भी नहीं
इस व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी समस्या उन महिला पुलिसकर्मियों को लेकर बताई जा रही है, जिन्हें दोपहिया वाहन चलाना नहीं आता और उनके पास ड्राइविंग लाइसेंस भी नहीं है। ऐसी स्थिति में उन्हें सीधे फील्ड ड्यूटी के लिए स्कूटी उपलब्ध कराना आसान नहीं है। विभाग अब इस बात पर विचार कर रहा है कि ‘पुलिस दीदी’ की जिम्मेदारी ऐसे पुलिसकर्मियों को दी जाए, जो दोपहिया वाहन चलाने में सक्षम हों और क्षेत्र में जाकर प्रभावी तरीके से काम कर सकें।
स्कूटी नहीं चलाने वालों का हो सकता है तबादला
सिटी एसपी मध्य ममता कल्याणी ने कहा है कि जिन महिला पुलिसकर्मियों को स्कूटी चलाना नहीं आता, उनका ग्रामीण क्षेत्रों में तबादला किया जाएगा। विभाग की कोशिश है कि उनकी जगह ऐसी महिला पुलिसकर्मियों की तैनाती की जाए, जो दोपहिया वाहन चलाने में सक्षम हों। इस बदलाव का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ‘पुलिस दीदी’ योजना केवल कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि महिला पुलिसकर्मी वास्तव में अपने क्षेत्र में जाकर पुलिसिंग की जिम्मेदारी निभाएं।
मौके से सेल्फी भेजनी होगी
विभाग ने ‘पुलिस दीदी’ व्यवस्था की निगरानी के लिए एक और व्यवस्था लागू करने की बात कही है। क्षेत्र में निरीक्षण करने वाली महिला पुलिसकर्मियों को मौके से सेल्फी लेकर विभाग को भेजनी होगी। इसका उद्देश्य यह जांचना है कि स्कूटी का इस्तेमाल वास्तव में फील्ड विजिट और पुलिसिंग के लिए किया जा रहा है या नहीं। इससे अधिकारियों को महिला पुलिसकर्मियों की क्षेत्र में मौजूदगी और नियमित भ्रमण की निगरानी करने में मदद मिलेगी।
महिला कॉलेजों के बाहर अभी नहीं दिखी पुलिस दीदी
महिला सुरक्षा के लिए व्यवस्था शुरू किए जाने के बावजूद अब तक किसी महिला कॉलेज के गेट पर ‘पुलिस दीदी’ की मौजूदगी नहीं दिखने की बात सामने आई है। वहीं सचिवालय थाना क्षेत्र में भी स्कूटी खड़ी रहने की जानकारी सामने आई है। ऐसे मामलों ने योजना के वास्तविक क्रियान्वयन को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। व्यवस्था का मूल उद्देश्य ही महिला और छात्राओं की सुरक्षा के लिए पुलिस की मौजूदगी बढ़ाना है। ऐसे में वाहनों का फील्ड में नियमित इस्तेमाल होना जरूरी माना जा रहा है।
दूसरे जिलों में भी स्कूटी वितरण का इंतजार
यह समस्या केवल पटना तक सीमित नहीं है। जानकारी के मुताबिक, वैशाली, भागलपुर समेत कई अन्य जिलों में स्कूटी अभी पुलिस लाइन में ही खड़ी हैं। इन जिलों में थानों के स्तर पर वाहनों का वितरण अभी नहीं किया गया है। पटना में 26 अगस्त को महिला पुलिसकर्मियों को स्कूटी और बाइक उपलब्ध कराई गई थीं। इसके बाद अब इनके इस्तेमाल और फील्ड ड्यूटी को लेकर निगरानी बढ़ाने की तैयारी की जा रही है।
महिला पुलिस बल की कमी भी बनी चुनौती
सिटी एसपी मध्य के मुताबिक, कुछ थानों में महिला पुलिसकर्मियों की कमी की जानकारी भी मिली है। इस समस्या को दूर करने के लिए पुलिस लाइंस से अतिरिक्त महिला पुलिस बल उपलब्ध कराने की बात कही गई है। दरअसल, ‘पुलिस दीदी’ व्यवस्था को सफल बनाने के लिए केवल वाहन उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। प्रशिक्षित महिला पुलिसकर्मियों की पर्याप्त संख्या, ड्राइविंग क्षमता और नियमित फील्ड मॉनिटरिंग भी जरूरी है। अब विभाग के सामने चुनौती है कि उपलब्ध संसाधनों का सही इस्तेमाल सुनिश्चित करते हुए इस पहल को जमीन पर प्रभावी बनाया जाए।



