- 10 साल पहले बनी योजना आज तक अधूरी, जनता पूछ रही है: जवाब कौन देगा?
- झील नहीं भरी, टंकी भी नहीं। पर जेबें भर गईं – यही है कांके में विकास का असली चेहरा।
Mukesh Ranjan, विशेष संवाददाता
Ranchi : झारखंड की राजधानी रांची से सटे कांके प्रखंड में सरकारी योजनाओं की सच्चाई एक टंकी के सूख जाने से ज़्यादा गहराई लिए हुए है। लाखों रुपये की लागत से बनी पेयजल टंकी और शौचालय अब सिर्फ काई, कचरा और झाड़ियां उगाने का काम कर रहे हैं। इस बदहाल तस्वीर ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है — क्या वाकई यह “विकास” है?
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जहां पानी नहीं, वहां भी बनी टंकी:
प्रखंड कार्यालय परिसर में मौजूद यह टाइल लगी टंकी वर्षों से यूं ही सूखी खड़ी है। नल सूखे हैं, पानी का नामोनिशान नहीं। वहीं पीछे मौजूद शौचालय की हालत इतनी खराब है कि कोई पास भी नहीं जाना चाहता — टूटी खिड़कियां, गंदी दीवारें और झाड़ियों से घिरा परिसर, विकास की नहीं, उपेक्षा की कहानी कहता है।
शिलापट्ट गायब, जिम्मेदारी भी:
जिन परियोजनाओं पर लाखों खर्च हुए, वहां शिलापट्ट तक नहीं लगाया गया। न कोई जानकारी कि यह निर्माण किस योजना के तहत हुआ, न कोई कार्यकारी एजेंसी का नाम, न लागत की घोषणा। यह चुप्पी ही आज सबसे बड़ा घोटाला बन चुकी है।
कागज़ पर पूरा, ज़मीन पर अधूरा
स्थानीय लोगों ने बताया कि ऐसी चार योजनाएं वर्षों पहले कागजों पर शुरू हुईं थीं। इनमें डीप बोरिंग, सोलर सिस्टम, पेयजल टंकी और शौचालय शामिल थे। परंतु किसी का भी संचालन कभी शुरू नहीं हुआ।
यह टंकी नहीं, धोखा है। एक लोटा पानी भी नहीं मिला इससे, — एक स्थानीय बुजुर्ग की व्यथा।
10 साल पुराना निर्माण, अब भी इंतज़ार में:
सूत्रों के मुताबिक, यह निर्माण कार्य लगभग एक दशक पहले हुआ था, लेकिन आज तक न ही इनका उद्घाटन हुआ, न ही यह प्रखंड कार्यालय को विधिवत हैंडओवर किए गए।
प्रशासन से जनता का सीधा सवाल:
- इन अधूरी योजनाओं की ज़िम्मेदारी किसकी है?
- बिना उपयोग के इन संरचनाओं की देखरेख कौन करेगा?
- क्या भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई होगी या फिर फाइलों में दबा रहेगा मामला?
मुखिया संघ ने जताई नाराजगी:
हाल ही में हुई मुखिया संघ की बैठक में इन मुद्दों पर कड़ा विरोध जताया गया। जनप्रतिनिधियों ने इसे ‘जनता के साथ धोखा’ बताया और तुरंत जांच तथा कार्रवाई की मांग की।
कांके को चाहिए काम, जवाबदेही और न्याय :
अब जनता सिर्फ वादे नहीं, परिणाम चाहती है। विकास का मतलब केवल टंकी और दीवारें नहीं, उनका उपयोग और देखरेख भी है। यह तस्वीरें सिर्फ एक जगह की नहीं, बल्कि सिस्टम की सड़ांध की निशानी हैं।

