Ranchi: झारखंड की राजनीति में इन दिनों एक नया सुर सुनाई दे रहा है — और वो है संविधान की आवाज़। समाजसेवी और सामाजिक चेतना की सशक्त आवाज़ सोमा उरांव ने हाल ही में अपने बयान से राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। उनका संदेश साफ है: “नेता नहीं, संविधान चाहिए।”
सोमा उरांव ने ऐसे नेताओं पर तीखा हमला बोला है जो खुद को समाज का मार्गदर्शक बताते हैं, लेकिन संविधान की बुनियादी समझ तक नहीं रखते। उन्होंने कहा, “इसी तरह के लोग समाज को बांटते हैं, अपना कुछ ज्ञान रखते नहीं और कहते हैं समाज को हम नेतृत्व करते हैं, किस हिसाब से? पहले जाकर संविधान पढ़े, फिर बात करें।”
उनके इस बयान ने न केवल राजनीतिक गलियारों में चर्चा को जन्म दिया, बल्कि सोशल मीडिया पर भी भूचाल ला दिया है। हजारों युवाओं ने उनके विचारों का समर्थन करते हुए इसे एक वैचारिक आंदोलन की शुरुआत बताया है।
सोमा ने नेतृत्व की परिभाषा को नए सिरे से गढ़ा है। उन्होंने कहा कि सच्चा नेता वही है जो संविधान की समझ रखता हो, ज़मीनी हकीकत से जुड़ा हो और सामाजिक न्याय के प्रति समर्पित हो।
उनके अनुसार, नेतृत्व का असली फॉर्मूला है:
नेतृत्व = संविधान की समझ + ज़मीनी ईमानदारी + सामाजिक न्याय की प्रतिबद्धता
सोमा उरांव ने युवाओं से अपील करते हुए कहा कि वे भीड़ के पीछे अंधे होकर न चलें। सोचें, सवाल करें और उस नेता को चुनें जो संविधान को माने, न कि स्वार्थ की राजनीति को।
उनकी इस सोच ने युवाओं के बीच एक नई चेतना पैदा की है। इंटरनेट पर वायरल हो रहा उनका यह विचार एक आंदोलन का रूप लेता जा रहा है। यह केवल नेताओं पर हमला नहीं, बल्कि उस मानसिकता पर सीधा वार है जो विचार से ज़्यादा चेहरों को तवज्जो देती है।
अब वक्त है, विचार चुनने का — और विचार वही, जो संविधान से निकले।



