Ranchi: झारखंड की राजधानी रांची में एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक क्षण सामने आया, जब ट्राइब फर्स्ट अभियान के तहत आयोजित पाहन महासम्मेलन ने राज्य में आदिवासी संस्कृति और पहचान को एक नई ऊर्जा दी। यह आयोजन न सिर्फ परंपराओं की वापसी का प्रतीक बना, बल्कि आत्मगौरव और सामाजिक चेतना का उद्घोष भी बना।

सम्मेलन की शुरुआत परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ हुई। हीरामुंन मुंडा ने पारंपरिक पूजा कर आयोजन का शुभारंभ किया। इसके बाद गोंडी लोकगीतों और पारंपरिक नृत्यों ने माहौल को एक सांस्कृतिक उत्सव में बदल दिया।
वक्ताओं ने कहा कि पाहन केवल एक पुजारी नहीं होता, बल्कि वह सामाजिक न्याय, नैतिक नेतृत्व और संस्कृति का संवाहक होता है। पहानों ने सदियों से गांवों में नैतिक दिशा देने का काम किया है। इस विलुप्त होती परंपरा को आधुनिक झारखंड की पहचान में फिर से स्थापित करने का यह सही समय है।
सम्मेलन में कुछ महत्वपूर्ण प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किए गए:
- पाहन सम्मान दिवस को राज्य स्तर पर मान्यता दी जाए
- हर गांव में पाहन समितियों का गठन हो
- पारंपरिक धार्मिक विधियों को कानूनी संरक्षण दिया जाए
- पाहन परंपरा को शैक्षणिक पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए
ट्राइब फर्स्ट अभियान के इस प्रयास को पूरे राज्य से भारी समर्थन मिला। सिमडेगा, खूंटी, गुमला, लोहरदगा, लातेहार और रांची समेत कई जिलों से पहान प्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी, महिलाएं और युवा इस सम्मेलन में जुटे। उनकी उपस्थिति ने यह संकेत दिया कि यह केवल एक सम्मेलन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का आरंभ है।
सम्मेलन में प्रमुख रूप से आरती कुजुर, रितेश उरांव, बिरसा पाहन, पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा, सतदेव मुंडा, संदीप उरांव, सोमा उरांव, सनी टोप्पो, मुखिया पुष्पा तिर्की और अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
यह सम्मेलन सिर्फ अतीत की याद नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने का माध्यम बन गया। परंपरा अब बोझ नहीं, बल्कि गौरव बनकर लौट रही है।



