- बिहार में आरक्षण के उप-वर्गीकरण को लेकर NDA में मतभेद सामने आए हैं। चिराग पासवान के बाद LJP सांसद अरुण भारती ने जीतनराम मांझी से कई सवाल पूछे।
Patna : बिहार में आरक्षण की समीक्षा और इसके उप-वर्गीकरण के मुद्दे पर NDA के भीतर सियासी मतभेद सामने आए हैं। केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी आरक्षण में वर्गीकरण की मांग कर रहे हैं, जबकि केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान इसका विरोध कर रहे हैं। चिराग पासवान के बयान के बाद अब LJP (राम विलास) सांसद और जमुई से सांसद अरुण भारती ने भी मांझी पर निशाना साधा है।
अरुण भारती ने जीतनराम मांझी पर दलित समाज को बांटने की कोशिश करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि मांझी ने आरक्षण के सब-कैटेगराइजेशन की बात करते हुए पंजाब का उदाहरण दिया, लेकिन बिहार का जिक्र नहीं किया।
बिहार में 2007 से दलित-महादलित वर्गीकरण का मुद्दा
अरुण भारती ने कहा कि बिहार में दलित और महादलित का वर्गीकरण वर्ष 2007 में ही शुरू हो गया था। उनके मुताबिक, महादलित वर्ग में मुख्य रूप से मुसहर और भुइयां समाज के लोग आते हैं।
उन्होंने सवाल उठाया कि इस वर्गीकरण को शुरू हुए 19 साल हो चुके हैं, लेकिन इन समुदायों की स्थिति में कितना वास्तविक बदलाव आया है, यह जीतनराम मांझी को बताना चाहिए।
सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी पर उठाया सवाल
अरुण भारती ने कहा कि जीतनराम मांझी बिहार के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और SC/ST कल्याण विभाग भी लंबे समय तक उनके परिवार के पास रहा है। ऐसे में यह बताना जरूरी है कि इन समुदायों की स्थिति सुधारने के लिए क्या कदम उठाए गए।
उन्होंने बिहार सरकार के आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया कि मुसहर और भुइयां समुदाय की सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी केवल 0.3 प्रतिशत है। अरुण भारती ने कहा कि मांझी के मुख्यमंत्री रहने और करीब 10 साल तक SC/ST कल्याण विभाग परिवार के पास रहने के बावजूद स्थिति ऐसी क्यों है, इसका जवाब उन्हें देना चाहिए।
‘90 प्रतिशत लाभ कुछ लोगों को मिलता है’ दावे पर सवाल
अरुण भारती ने मांझी के उस कथित बयान पर भी सवाल उठाया, जिसमें उन्होंने कहा है कि आरक्षण का 90 प्रतिशत लाभ कुछ ही लोगों को मिलता है।
उन्होंने पूछा कि इस दावे का आधार क्या है और क्या इसके समर्थन में कोई सर्वे या आंकड़े मौजूद हैं। अरुण भारती ने कहा कि यदि ऐसे आंकड़े हैं तो उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
दलित प्रतिनिधित्व को लेकर भी मांझी से सवाल
LJP सांसद ने कहा कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाना सरकार और नेताओं के हाथ में रहा है। उन्होंने सवाल किया कि मुसहर और भुइयां समुदाय के कितने लोगों को सांसद या विधायक बनने में मदद मिली है।
उन्होंने कहा कि जीतनराम मांझी मंत्री हैं और उनके बेटे, बहू तथा समधन विधायक हैं, लेकिन मुसहर और भुइयां समाज के लोग सांसद और विधायक क्यों नहीं हैं।
बैकलॉग और बड़े संस्थानों में प्रतिनिधित्व पर बहस की मांग
अरुण भारती ने कहा कि आरक्षण के वर्गीकरण की बात करने से पहले यह भी समीक्षा होनी चाहिए कि आरक्षण का बैकलॉग कब भरा जाएगा। उन्होंने IIT, IIM, AIIMS, विश्वविद्यालयों और अन्य बड़े संस्थानों में दलित प्रोफेसरों की संख्या पर भी चर्चा की मांग की।
उन्होंने निजी क्षेत्र में आरक्षण नहीं होने की स्थिति में दलित समुदाय की हिस्सेदारी को लेकर भी सवाल उठाया। साथ ही न्यायपालिका, कार्यपालिका और विश्वविद्यालयों में दलित समुदाय के प्रतिनिधित्व पर जीतनराम मांझी से जवाब मांगा।
अरुण भारती ने कहा कि आरक्षण के वर्गीकरण की बात करने से मौजूदा दलित आरक्षण को बांटने का सवाल खड़ा होता है। उनके मुताबिक, किसी चीज के टूटने से वह कमजोर होती है।



