PM Awas Yojana से बदली दरभंगा के गांवों की तस्वीर, बने पक्के घर

दरभंगा: कभी मिट्टी की दीवार, फूस की छत और बारिश में टपकते घर ग्रामीण जीवन की पहचान हुआ करते थे। बरसात में झोपड़ी में रहने वाले परिवारों के लिए रात गुजारना चुनौती से कम नहीं होता था। ऐसे परिवारों के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण महज

PM Awas Yojana से बदली दरभंगा के गांवों की तस्वीर, बने पक्के घर
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दरभंगा: कभी मिट्टी की दीवार, फूस की छत और बारिश में टपकते घर ग्रामीण जीवन की पहचान हुआ करते थे। बरसात में झोपड़ी में रहने वाले परिवारों के लिए रात गुजारना चुनौती से कम नहीं होता था। ऐसे परिवारों के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण महज सरकारी योजना नहीं, बल्कि पक्की छत और सम्मान के साथ जीवन जीने का जरिया बनकर सामने आई है।

दरभंगा जिले के ग्रामीण इलाकों में पिछले वर्षों में गांवों की तस्वीर में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। जहां कभी दूर-दूर तक फूस और खपरैल के मकान नजर आते थे, वहीं अब बड़ी संख्या में पक्के मकान दिखाई देते हैं। गरीब परिवारों के लिए अपना पक्का घर होना उनकी सबसे बड़ी जरूरतों में शामिल रहा है और प्रधानमंत्री आवास योजना ने इस जरूरत को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

झोपड़ी से पक्के घर तक का सफर

प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के तहत ऐसे परिवारों को प्राथमिकता दी जाती है जो आवासविहीन हैं या कच्चे और जर्जर मकानों में रहने को मजबूर हैं। योजना के तहत मिलने वाली आर्थिक सहायता से लाभुक अपने लिए पक्का मकान तैयार करते हैं।

कई परिवारों के लिए यह पहली बार है जब उनके पास बारिश, आंधी और गर्मी से सुरक्षित अपना घर है। दरभंगा के गांवों में इस बदलाव को साफ तौर पर देखा जा सकता है।

जिन परिवारों के घर कभी फूस की छत से ढके होते थे, उनके आंगन में अब ईंट और सीमेंट से बने मकान खड़े हैं। बच्चों को पढ़ने के लिए सुरक्षित जगह मिली है, जबकि महिलाओं और बुजुर्गों को भी मौसम की मार से राहत मिली है।

2.13 लाख से अधिक आवास हुए पूर्ण

उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2016-17 से 2021-22 तक दरभंगा जिले में 2 लाख 13 हजार 527 प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के मकान पूर्ण कराए गए थे। यह निर्धारित लक्ष्य का 99.18 प्रतिशत था।

यह आंकड़ा बताता है कि जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में योजना का व्यापक स्तर पर क्रियान्वयन हुआ है। इसके बाद भी आवास निर्माण की प्रक्रिया जारी है।

वित्तीय वर्ष 2026-27 में 17 हजार 579 आवासों के पूर्ण होने की जानकारी जिला स्तर पर आयोजित कार्यक्रम में दी गई। पूर्ण मकानों के लाभुकों को गृह प्रवेश कराया गया, जबकि नए लाभुकों को स्वीकृति पत्र दिए गए।

पक्के मकान ने बढ़ाया गरीबों का आत्मविश्वास

किसी गरीब परिवार के लिए पक्का मकान केवल चार दीवारें नहीं होता। यह सुरक्षा, सम्मान और भविष्य का आधार भी होता है। फूस की झोपड़ी में रहने वाले परिवारों को हर बरसात में घर गिरने या सामान भीगने की चिंता रहती थी। पक्का मकान मिलने के बाद ऐसी चिंताओं से काफी हद तक राहत मिली है।

घर का असर परिवार के बच्चों की पढ़ाई पर भी पड़ता है। सुरक्षित वातावरण मिलने से बच्चों को पढ़ने के लिए बेहतर जगह मिलती है। महिलाओं के लिए भी पक्का घर सुरक्षा और निजता का अहसास देता है।

इस लिहाज से आवास योजना का प्रभाव केवल मकान निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण परिवारों के जीवन स्तर में बदलाव से भी जुड़ा हुआ है।

गांव-गांव बदल रहा आवास का स्वरूप

दरभंगा के ग्रामीण इलाकों में सड़क किनारे और गांवों के भीतर अब बड़ी संख्या में नए पक्के मकान नजर आने लगे हैं। फूस की छतों की जगह पक्की छतों ने ले ली है।

हालांकि अभी भी कई गांवों में गरीब परिवार कच्चे या जर्जर मकानों में रह रहे हैं। इसका संकेत वर्ष 2024-25 के आवास सर्वे से भी मिलता है, जिसमें जिले में 3 लाख 2 हजार 933 आवासविहीन परिवार चिह्नित किए जाने की जानकारी सामने आई थी।

यह आंकड़ा यह भी बताता है कि योजना के माध्यम से बड़ी संख्या में परिवारों को लाभ मिलने के बावजूद आवास की जरूरत अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। सर्वे में चिह्नित सभी परिवार स्वतः योजना के पात्र नहीं माने जा सकते। पात्रता और सत्यापन के बाद ही लाभुकों का अंतिम चयन होता है।

अब चुनौती है हर पात्र परिवार तक पहुंच

प्रधानमंत्री आवास योजना ने ग्रामीण दरभंगा की तस्वीर बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि अगली चुनौती उन परिवारों तक पहुंचने की है जो अब भी झोपड़ी, फूस या जर्जर मकान में जीवन गुजार रहे हैं।

जरूरत इस बात की है कि वास्तविक जरूरतमंद परिवारों का पारदर्शी तरीके से चयन हो, उन्हें समय पर स्वीकृति मिले और निर्माण के लिए निर्धारित राशि की किस्तें समय पर उपलब्ध कराई जाएं।

गांवों की तस्वीर अभी पूरी तरह नहीं बदली है, लेकिन बदलाव साफ दिखाई दे रहा है। जहां कभी फूस की झोपड़ियां थीं, वहां अब गांव-गांव पक्के मकान नजर आने लगे हैं।

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