रांची: JPSC-JSSC परीक्षा में कथित पेपर लीक, ओएमआर में हेराफेरी और अभ्यर्थियों को अवैध तरीके से लाभ पहुंचाने के मामले की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे कई नए तथ्य सामने आ रहे हैं। CID ने विशेष अदालत में गिरफ्तार आरोपियों की पृष्ठभूमि, उनके कारोबारी संबंधों और आपसी संपर्क से जुड़ी कई जानकारियां रखी हैं। जांच के केंद्र में JPSC की परीक्षा प्रक्रिया से जुड़ी एजेंसी टीएसआर डेटा प्रोसेसिंग प्राइवेट लिमिटेड (TDPL), उसके निदेशक रामबीर सिंह, मोहम्मद उस्मान और JPSC की तत्कालीन उप परीक्षा नियंत्रक श्वेता गुप्ता समेत अन्य लोग हैं।
CID का कहना है कि जांच के दौरान आरोपियों के बीच संपर्क और परीक्षा से जुड़े काम मिलने की कड़ियों को खंगाला जा रहा है। एजेंसी के मुताबिक, इन संपर्कों के जरिए परीक्षा प्रक्रिया में कथित तौर पर अनियमितता और अभ्यर्थियों को अनुचित लाभ पहुंचाने की व्यवस्था तैयार होने के आरोपों की पड़ताल की जा रही है।
TDPL निदेशक रामबीर सिंह का पुराना रिकॉर्ड भी जांच में आया सामने
CID के अनुसार, TDPL के निदेशक रामबीर सिंह ने वर्ष 2005 में उत्तर प्रदेश में दारोगा भर्ती की प्रारंभिक परीक्षा पास की थी। हालांकि, वह अंतिम चयन में जगह नहीं बना सके। इसके बाद वर्ष 2010 में उन्होंने TDPL नाम से कंपनी शुरू की।
शुरुआत में रामबीर सिंह के साथ तारिक और सत्यपाल सिंह कंपनी के निदेशक थे। कंपनी का काम केवल परीक्षा से जुड़ा नहीं था। इसके जरिए शेयर मार्केटिंग, चुनावी गतिविधियों से संबंधित काम, टेंडर और आधार कार्ड से जुड़े कार्य भी किए जाते थे। जांच के मुताबिक, वर्ष 2013 में तारिक ने कंपनी से इस्तीफा दे दिया।
CID अब यह भी जांच कर रही है कि कंपनी के पुराने कारोबारी नेटवर्क का आगे चलकर परीक्षा संचालन से जुड़े कामों तक किस तरह विस्तार हुआ।
लालू प्रसाद के जरिए अभय तिवारी से हुई मुलाकात
जांच एजेंसी ने अदालत को बताया है कि वर्ष 2022-23 के दौरान दिल्ली में रामबीर सिंह की मुलाकात मध्य प्रदेश के मुरैना निवासी लालू प्रसाद से हुई थी। इसी मुलाकात के बाद लालू प्रसाद ने रामबीर की पहचान अभय तिवारी से कराई।
CID के मुताबिक, अभय तिवारी की मदद के बाद TDPL को वर्ष 2023 में JPSC से संबंधित काम मिला। इसके बाद परीक्षा संचालन से जुड़े कार्यों में कंपनी की भूमिका बढ़ती चली गई। जांच एजेंसी अब इस बात की पड़ताल कर रही है कि TDPL को JPSC से काम मिलने की पूरी प्रक्रिया क्या थी और इस दौरान किन-किन लोगों की भूमिका रही।
मोहम्मद उस्मान का तकनीकी नेटवर्क भी जांच के दायरे में
मामले में गिरफ्तार दूसरे आरोपी मोहम्मद उस्मान का भी तकनीकी और कारोबारी इतिहास CID की जांच में सामने आया है। उसने वर्ष 2009 में स्नातक की पढ़ाई पूरी की थी। इसके बाद 2010 से 2016 तक वह मेगा सॉफ्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम प्राइवेट लिमिटेड में तकनीकी सपोर्ट इंजीनियर के तौर पर काम करता था।
वर्ष 2017 में उस्मान ने अपने सहयोगी हेमंत कुमार वर्मा के साथ मिलकर पीकर टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी बनाई। लखनऊ मुख्यालय वाली यह कंपनी बैंकिंग सेक्टर के लिए सॉफ्टवेयर उपलब्ध कराने का काम करती थी।
CID के अनुसार, वर्ष 2020 में हेमंत वर्मा के माध्यम से उस्मान की मुलाकात रामबीर सिंह से हुई। इसके बाद उसे उत्तर प्रदेश विधानसभा में आरओ और एआरओ परीक्षा के आवेदन फॉर्म तथा प्रवेश पत्र तैयार करने का काम मिला।
2025 में फिर जुड़ा रामबीर और उस्मान का संपर्क
जांच एजेंसी के अनुसार, वर्ष 2025 में रामबीर सिंह ने मोहम्मद उस्मान से दोबारा संपर्क किया। इसके बाद झारखंड में JPSC से जुड़ी तकनीकी व्यवस्था तैयार कराने की बात सामने आई।
CID का आरोप है कि इसी नेटवर्क के जरिए अभ्यर्थियों से पैसे लेकर उन्हें परीक्षा में कथित तौर पर अनुचित लाभ पहुंचाने की व्यवस्था तैयार की गई। हालांकि, इस पूरे मामले में आरोपों की वास्तविकता और प्रत्येक आरोपी की भूमिका जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।
श्वेता गुप्ता की भूमिका भी CID की जांच में अहम
मामले में गिरफ्तार JPSC की तत्कालीन उप परीक्षा नियंत्रक श्वेता गुप्ता के सेवा इतिहास को भी CID ने अदालत के समक्ष रखा है। वर्ष 2010 में तीसरी JPSC परीक्षा के जरिए उनका चयन हुआ था। इसके बाद उनकी पहली पोस्टिंग रामगढ़ BDO के तौर पर हुई।
उन्होंने इटकी BDO, रांची में कार्यपालक दंडाधिकारी, महिला एवं बाल विकास तथा सामाजिक सुरक्षा विभाग में सहायक निदेशक और राजभवन में अवर सचिव जैसे पदों पर भी काम किया।
वर्ष 2024 में श्वेता गुप्ता को JPSC में उप परीक्षा नियंत्रक बनाया गया। CID के मुताबिक, परीक्षा नियंत्रक के अवकाश पर रहने के दौरान उन्होंने आयोग के कई महत्वपूर्ण कार्यों की जिम्मेदारी संभाली।
11वीं और 13वीं सिविल सेवा परीक्षा भी जांच के केंद्र में
CID के अनुसार, श्वेता गुप्ता के कार्यकाल के दौरान JPSC की 11वीं और 13वीं सिविल सेवा परीक्षा के साक्षात्कार आयोजित किए गए थे। इसके अलावा पूर्व अध्यक्ष एल. खियांग्ते के आदेश के बाद परीक्षा परिणाम जारी करने की प्रक्रिया में भी उनकी भूमिका रही थी।
जांच एजेंसी अब यह पता लगाने में जुटी है कि परीक्षा प्रक्रिया के दौरान किन स्तरों पर निर्णय लिए गए और गिरफ्तार आरोपियों के साथ अधिकारियों या बाहरी एजेंसियों का संपर्क किस तरह रहा।
दस्तावेज और बयानों से जुड़ी कड़ियां जोड़ रही CID
JPSC-JSSC परीक्षा गड़बड़ी मामले में CID की जांच अब केवल पेपर लीक या ओएमआर में कथित हेराफेरी तक सीमित नहीं रह गई है। एजेंसी आरोपियों के पुराने रिकॉर्ड, कंपनियों के कारोबारी संबंध, तकनीकी सेवाओं और परीक्षा संचालन से जुड़े संपर्कों की भी जांच कर रही है।
जांच में सामने आ रहे दस्तावेजों और बयानों के आधार पर यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि कथित अनियमितता का नेटवर्क कितना बड़ा था और इसमें कौन-कौन लोग शामिल थे। आने वाले दिनों में जांच के आगे बढ़ने के साथ इस मामले में और भी अहम खुलासे होने की संभावना है।



