Ranchi : भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के राष्ट्रीय प्रोफेसर (पौधा रोग विभाग) डॉ वीके बर्णवाल ने कहा कि फसल उत्पादन में बीज वाहित विषाणुओं से बचाव के लिए प्रमाणित बीज और रोपण सामग्री का ही प्रयोग अनिवार्य है। उन्होंने चेताया कि बचाव नियंत्रण से हमेशा बेहतर होता है और इसके लिए आधुनिक जांच तकनीकों का उपयोग करना समय की मांग है।
डॉ बर्णवाल शनिवार को बिरसा कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) में ‘आधुनिक जांच उपकरणों द्वारा विषाणु जनित रोगों की पहचान एवं प्रबंधन’ विषय पर आयोजित आमंत्रित व्याख्यान को संबोधित कर रहे थे।
प्रमुख बातें:
विषाणुओं का व्यापक प्रभाव: उन्होंने बताया कि अब तक विश्व में 10 हजार से अधिक विषाणुओं की पहचान हो चुकी है, जिनमें लगभग 4000 पौधों को प्रभावित करते हैं।
संक्रमण के स्रोत: बीज, रोपण सामग्री, हवा एवं सतह के माध्यम से विषाणुओं का प्रसार होता है।
तकनीकी नवाचार: वायरस की पहचान के लिए एलिसा और पीसीआर जैसी अत्याधुनिक तकनीकों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि बिना सटीक तकनीक और दक्ष मानव संसाधन के विषाणु जांच संभव नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय अनुभव: अमेरिका में पौधों के विषाणु नियंत्रण के कड़े नियमों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वहां एक भी संक्रमित पौधा मिलने पर पूरा लॉट नष्ट कर दिया जाता है।
उन्होंने बताया कि भारत सरकार ने ‘स्वच्छ और सुरक्षित पौधा कार्यक्रम’ के तहत पौधों के वायरस प्रबंधन के लिए 1800 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया है, जिसका संचालन एडवांस्ड सेंटर फॉर प्लांट वायरोलॉजी, नई दिल्ली द्वारा किया जा रहा है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता बीएयू के कुलपति डॉ एससी दुबे ने की। कृषि संकाय के डीन डॉ डीके शाही ने स्वागत भाषण दिया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ लाम दोर्जी ने किया। कार्यक्रम में पौधा रोग विभाग के अध्यक्ष डॉ एचसी लाल ने अतिथि का परिचय कराया।
व्याख्यान के बाद डॉ एमके गुप्त, डॉ एस कर्मकार और डॉ नंदनी कुमारी ने भी अपनी जिज्ञासाएं रखीं, जिनका डॉ बर्णवाल ने विस्तार से समाधान किया।

