अब राज्य का दायित्व: प्रेम विवाह करने वाले जोड़े को सुरक्षा और संरक्षण

Prayagraj : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बालिगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और उनके विवाह के अधिकार को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि दो बालिग व्यक्ति अपनी मर्जी से विवाह करते हैं, तो इसे परिवार या समाज का सम्मान या प्रतिष्ठा

अब राज्य का दायित्व: प्रेम विवाह करने वाले जोड़े को सुरक्षा और संरक्षण
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Prayagraj : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बालिगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और उनके विवाह के अधिकार को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि दो बालिग व्यक्ति अपनी मर्जी से विवाह करते हैं, तो इसे परिवार या समाज का सम्मान या प्रतिष्ठा का मामला नहीं बनाया जा सकता। यह निर्णय न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया।

मामला एक ऐसे जोड़े से जुड़ा था, जिन्होंने अपनी सहमति से आर्य समाज मंदिर में विवाह किया और उनके पास वैध विवाह प्रमाणपत्र भी मौजूद था। याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि महिला के परिवार वाले इस विवाह के खिलाफ हैं और उन्होंने उनके खिलाफ झूठा आपराधिक मामला दर्ज करवा दिया। दंपति ने अपनी सुरक्षा की चिंता जताते हुए कहा कि उन्हें “ऑनर किलिंग” का खतरा है।

कोर्ट ने इस गंभीर स्थिति को देखते हुए दंपति को अंतरिम राहत प्रदान की और उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगाई। साथ ही, अदालत ने महिला के परिवार को कड़ी चेतावनी दी कि वे दंपति को किसी भी तरह की शारीरिक या मानसिक क्षति न पहुंचाएं। परिवार को निर्देश दिया गया कि वे दंपति के घर में प्रवेश न करें और न ही उनसे सीधे या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम जैसे फोन या सोशल मीडिया के जरिए संपर्क करने की कोशिश करें।

अलीगढ़ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को भी आदेश दिया गया कि वे सुनिश्चित करें कि नवविवाहित जोड़े की सुरक्षा पूरी तरह सुनिश्चित हो। मामले की अगली सुनवाई 8 अप्रैल को तय की गई है।

एक अन्य फैसले में न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह ने अंतरधार्मिक लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर बड़ा निर्णय दिया। अदालत ने अलग-अलग धर्मों से जुड़े युवक-युवती की सुरक्षा याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि भारत में अंतरधार्मिक लिव-इन संबंध अपराध नहीं हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के तहत मिले मौलिक अधिकारों को किसी को भी उनके धर्म या जाति के आधार पर रोका नहीं जा सकता।

इस आदेश में सोनभद्र के एक मुस्लिम युवक और उसकी हिंदू साथी को पुलिस सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश भी शामिल किया गया। अदालत ने कहा कि जाति, पंथ, लिंग या धर्म के आधार पर भेदभाव कानून में स्थान नहीं पा सकता।

यह फैसला देश में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, प्रेम विवाह और अंतरधार्मिक संबंधों के अधिकारों की सुरक्षा को लेकर एक मिसाल साबित हो रहा है।

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