Ranchi : झारखंड हाईकोर्ट ने राजधानी रांची स्थित राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (RIMS) की जमीन पर दशकों से चले आ रहे अवैध निर्माण और प्रशासनिक मिलीभगत को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने इस पूरे मामले की आपराधिक जांच एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) से कराने का आदेश दिया है और साफ कहा है कि जरूरत पड़ने पर CBI जांच भी कराई जा सकती है।
मुख्य न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद की खंडपीठ ने एसीबी को एफआईआर दर्ज कर राजस्व, अंचल, नगर निगम, रेरा और अन्य संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच करने का निर्देश दिया। अदालत ने दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई के भी आदेश दिए हैं। इस मामले की अगली सुनवाई 6 जनवरी को होगी।
🔴 अतिक्रमण हटाने का आदेश बरकरार
हाईकोर्ट ने पहले दिए गए आदेश को दोहराते हुए कहा कि RIMS की अधिग्रहित जमीन पर किसी भी तरह का निजी स्वामित्व मान्य नहीं है। तीन दिसंबर को जारी आदेश के तहत 72 घंटे में अतिक्रमण हटाने को कहा गया था।
🏗️ 1964-65 में अधिग्रहण, फिर कैसे हुआ निर्माण?
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वर्ष 1964-65 में भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत RIMS के लिए जमीन अधिग्रहित की गई थी और मुआवजा भी चुका दिया गया था। इसके बावजूद वर्षों तक अवैध रजिस्ट्री, म्यूटेशन, नक्शा पास, बैंक लोन और RERA अनुमति दी गई, जो गंभीर भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है।
⚖️ जनहित याचिका से खुला पूरा मामला
2018 में दाखिल जनहित याचिका की जांच में सामने आया कि RIMS परिसर की करीब 7 एकड़ जमीन पर मंदिर, दुकानें, अपार्टमेंट, पार्क और व्यावसायिक प्रतिष्ठान बना दिए गए। कोर्ट ने माना कि इससे अस्पताल की सेवाएं, सुरक्षा और स्वच्छता बुरी तरह प्रभावित हुई हैं।
💰 मुआवजा मिलेगा, लेकिन सरकारी खजाने से नहीं
अदालत ने कहा कि प्रभावित लोगों को मुआवजा दिया जाना चाहिए, लेकिन यह रकम दोषी अधिकारियों और बिल्डरों से वसूली जाएगी, न कि जनता के पैसे से। साथ ही, बिना सत्यापन सरकारी जमीन पर लोन देने वाले बैंकों पर भी सवाल उठाए गए हैं।






