- सामाजिक व्यवस्था, परंपरा और आदिवासी अस्मिता के सवाल पर खुली बहस की जरूरत : सोमा उरांव
मुकेश रंजन
Ranchi : मनुस्मृति को लेकर देश में जारी बहस के बीच आदिवासी नेता सोमा उरांव ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि किसी भी ऐतिहासिक ग्रंथ या परंपरा को लेकर चर्चा करते समय उसके सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ को समझना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की अपनी विशिष्ट परंपराएं, जीवन-पद्धति और सामाजिक व्यवस्था रही है, जिसे व्यापक विमर्श में उचित स्थान मिलना चाहिए।
सोमा उरांव ने कहा कि मनुस्मृति को लेकर अलग-अलग वर्गों और विचारधाराओं के अपने मत रहे हैं। ऐसे विषयों पर आरोप-प्रत्यारोप के बजाय तथ्य, इतिहास और सामाजिक अनुभवों के आधार पर सार्थक संवाद होना चाहिए। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की पहचान उसकी जल, जंगल, जमीन, संस्कृति, परंपरा और सामुदायिक जीवन-पद्धति से जुड़ी हुई है।
उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय और समानता के प्रश्नों पर चर्चा करते समय समाज के उन वर्गों की आवाज को भी सामने लाना जरूरी है, जिनकी अपनी अलग ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि रही है। उन्होंने आदिवासी समाज की परंपराओं और अधिकारों के संरक्षण पर जोर दिया।
सोमा उरांव ने कहा कि आज जरूरत ऐसी बहस की है, जिसमें इतिहास को राजनीतिक नजरिये से देखने के बजाय विभिन्न समुदायों के अनुभवों और परंपराओं को समझने का प्रयास किया जाए। उन्होंने सामाजिक सौहार्द और आपसी सम्मान के साथ संवाद आगे बढ़ाने की बात कही।



