- बाबूलाल मरांडी की मांग हताशा और विकास विरोधी राजनीति का परिचायक’
मुकेश रंजन
Ranchi : रांची स्थित रिनपास (रांची इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरो-साइकियाट्री एंड अलाइड साइंसेज) में स्थायी निदेशक की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। सरकार की ओर से स्थायी निदेशक की नियुक्ति की पहल का अंतिम समय में विरोध किए जाने पर झामुमो रांची जिला कमिटी के संयोजक सदस्य सोनू मुंडा ने नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि नियुक्ति प्रक्रिया का विरोध राज्य के महत्वपूर्ण स्वास्थ्य संस्थान के विकास में बाधा डालने वाला कदम है।
सोनू मुंडा ने आरोप लगाया कि लंबे समय तक राज्य में सत्ता में रहने के बावजूद भाजपा सरकार ने वर्ष 2007 से रिक्त पड़े रिनपास के स्थायी निदेशक पद को भरने के लिए गंभीर पहल नहीं की। उनके अनुसार, निदेशक का पद लंबे समय तक खाली रहने से संस्थान के विकास और प्रशासनिक व्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ा है।
उन्होंने कहा कि रिनपास एक स्वायत्त संस्थान है और यहां स्वीकृत 810 पदों में से 650 से अधिक पद रिक्त हैं। सोनू मुंडा ने इन रिक्तियों के लिए भाजपा नेतृत्व की नीतियों को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि संस्थान को मजबूत करने के लिए स्थायी निदेशक की नियुक्ति और रिक्त पदों को भरना जरूरी है।
‘भाजपा के स्थानीय नेताओं ने कभी नहीं उठाया मुद्दा’
सोनू मुंडा ने कहा कि कांके क्षेत्र के भाजपा विधायकों ने भी रिनपास में स्थायी निदेशक की नियुक्ति और रिक्त पदों को भरने का मुद्दा प्रभावी तरीके से नहीं उठाया। उन्होंने कहा कि अब जब सरकार ने वर्षों से लंबित नियुक्ति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की पहल की है, तब इसका विरोध करना समझ से परे है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि बाबूलाल मरांडी को विज्ञापन रद्द करने अथवा नियमावली में बदलाव की मांग करने से पहले संबंधित आदेश का गंभीरता से अध्ययन करना चाहिए। उनके मुताबिक, न्यायालय के आदेश में मनोचिकित्सा विभाग के प्राध्यापक की योग्यता को संस्थान के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट पद के संदर्भ में निर्धारित किया गया था, जबकि निदेशक पद के लिए मेंटल हेल्थ और इससे जुड़े विभागों के प्राध्यापक भी पात्र हैं।
19 साल से खाली पद, 11 सितंबर को हाईकोर्ट में सुनवाई
सोनू मुंडा ने कहा कि स्थायी निदेशक का पद करीब 19 वर्षों से रिक्त है और इसे लेकर हाईकोर्ट में मामला भी चल रहा है। उन्होंने बताया कि मामले में 11 सितंबर को सुनवाई प्रस्तावित है। ऐसे में नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाने के बजाय संस्थान के हित में इसे आगे बढ़ाने की जरूरत है।
उन्होंने दावा किया कि स्वास्थ्य विभाग की ओर से तैयार वर्तमान नियमावली नियुक्ति प्रक्रिया के लिए उपयुक्त है। उनके अनुसार, स्थायी निदेशक की नियुक्ति होने से रिनपास में प्रशासनिक स्थिरता आएगी और संस्थान के विकास को गति मिलेगी।
कांग्रेस ने भी सरकार की पहल का किया स्वागत
इधर कांग्रेस के प्रदेश सचिव मदन कुमार महतो और प्रखंड अध्यक्ष संजर खान ने भी स्वास्थ्य मंत्री और स्वास्थ्य विभाग की ओर से स्थायी निदेशक की नियुक्ति की पहल का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि रिनपास जैसे महत्वपूर्ण संस्थान को लंबे समय तक स्थायी नेतृत्व से वंचित रखना उचित नहीं है।
कांग्रेस नेताओं ने कहा कि स्थायी निदेशक की नियुक्ति के बाद संस्थान में रिक्त पदों को भरने, प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने और चिकित्सा एवं शैक्षणिक गतिविधियों को गति देने में मदद मिलेगी। उन्होंने दावा किया कि देश के कई प्रतिष्ठित संस्थानों के योग्य प्राध्यापक रिनपास से जुड़ने के लिए इच्छुक हैं। इनमें मनोचिकित्सा के साथ-साथ मेंटल हेल्थ और एलाइड साइंसेज से जुड़े विशेषज्ञ भी शामिल हैं।
राजनीतिक बयानबाजी के बीच रिनपास में स्थायी निदेशक की नियुक्ति का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। अब निगाहें नियुक्ति प्रक्रिया और 11 सितंबर को होने वाली प्रस्तावित न्यायिक सुनवाई पर टिकी हैं।



