New Delhi : सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करते हुए एक अहम फैसला दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला को निकाह के समय मिला सारा सामान, गहने, नकद राशि और रिश्तेदारों-दोस्तों से मिले सभी उपहार उसकी निजी संपत्ति माने जाएंगे, और तलाक के बाद पति को यह सब कानूनी रूप से वापस करना अनिवार्य होगा।
न्यायमूर्ति संजिव खन्ना की अध्यक्षता वाली तीन-न्यायाधीशों की पीठ— जिसमें न्यायमूर्ति संजय करोल और एन. कोटिश्वर सिंह शामिल थे— ने मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3 की व्यापक व्याख्या करते हुए कहा कि इसे महज सिविल विवाद नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि इस कानून को लैंगिक समानता, सम्मान और आर्थिक स्वायत्तता के संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप समझना आवश्यक है।
यह मामला कोलकाता की एक मुस्लिम महिला का था, जिसने अपने पूर्व पति के खिलाफ निकाह में मिले सामान और उपहार वापस पाने के लिए याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने महिला के दावों को पूरी तरह स्वीकारते हुए पूर्व पति को ₹17,67,980 छह हफ्तों के भीतर महिला के बैंक खाते में जमा करने का आदेश दिया।
शीर्ष अदालत ने 2022 के कलकत्ता हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा कि हाई कोर्ट ने मामले को सिर्फ एक सामान्य सिविल विवाद मानकर गलत व्याख्या की। कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट ने सामाजिक न्याय, संविधान और कानून की मूल भावना को नजरअंदाज किया।
कोर्ट ने 2001 के ऐतिहासिक डैनियल लतीफी बनाम भारत संघ मामले का हवाला देते हुए कहा कि 1986 के कानून का उद्देश्य तलाक के बाद मुस्लिम महिला को आर्थिक रूप से सशक्त करना है।
देशभर की मुस्लिम महिलाओं के लिए बड़ी राहत
इस फैसले के बाद तलाकशुदा महिलाओं को अब केवल मेहर या गुजारा भत्ता ही नहीं, बल्कि—
✔ मायके से आया सामान
✔ सोना-चांदी
✔ नकदी
✔ उपहार या गिफ्ट
—सभी वस्तुएं कानूनी रूप से वापस पाने का पूर्ण अधिकार होगा।
कानूनी विशेषज्ञों ने इस निर्णय को लैंगिक न्याय और महिला अधिकारों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है।



