Ranchi : जब दुनिया भर में 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस के रूप में उत्सव मनाया जा रहा था, तब रांची में जनजाति सुरक्षा मंच ने इस दिन को “शोक-सम्मान दिवस” के रूप में मनाकर एक ऐतिहासिक और भावनात्मक पहल की। मंच ने इसे एक सांस्कृतिक जागरूकता का अवसर बनाते हुए आदिवासी अस्मिता और ऐतिहासिक पीड़ा को सामने लाने का कार्य किया।
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जनजाति सुरक्षा मंच का मानना है कि यह दिन उत्सव का नहीं, बल्कि लाखों मूल निवासियों के नरसंहार की स्मृति में शोक व्यक्त करने का दिन होना चाहिए। मंच के संयोजकों ने स्पष्ट कहा कि यह वही दिन है जब कोलंबस कालीन विस्तारवाद, चर्च द्वारा फैलाए गए उपनिवेशी षड्यंत्रों और साजिशों के तहत आदिवासी समाज की जड़ें हिलाई गई थीं। महिलाओं पर अत्याचार, संस्कृतियों का उन्मूलन और मूल निवासियों की सामूहिक हत्या इसी दौर की दुखद गाथाएं हैं।
मंच का कहना है कि अमेरिका के शेष बचे मूल निवासी आज भी इस दिन को “ब्लैक डे” (काला दिवस) के रूप में मानते हैं। ऐसे में भारत में इस दिन को उत्सव के तौर पर मनाना उचित नहीं है। संयोजकों ने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2007 में घोषित 46 अनुच्छेद, जो आदिवासी अधिकारों की बात करते हैं, वे पहले से ही भारतीय संविधान में निहित हैं। ऐसे में “मूल निवासी दिवस” को “विश्व आदिवासी दिवस” में बदलना एक सांस्कृतिक षड्यंत्र है।
सभा में मौजूद सभी कार्यकर्ताओं ने एकजुट होकर सामूहिक मौन रखा, ‘ॐ शांति’ का उच्चारण किया और उन लाखों दिवंगत आत्माओं के लिए प्रार्थना की जो आदिवासी इतिहास की सबसे काली त्रासदी का हिस्सा बने।
इस भावुक आयोजन में मंच के प्रमुख कार्यकर्ता — सोमा उरांव (मीडिया प्रभारी), संदीप उरांव (संयोजक), जय मंगल उरांव, गणेश नायक, सुनील टोप्पो, शंकर टोप्पो, करण कुमार, राजू उरांव और गुड़िया कुमारी समेत बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे।
यह निर्णय लिया गया कि अब प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को इसी प्रकार श्रद्धांजलि सभा और शोक-सम्मान दिवस मनाया जाएगा ताकि आने वाली पीढ़ियां अपने इतिहास से परिचित हो सकें।

