मुकेश रंजन
Ranchi : चैत पूर्णिमा के पावन अवसर पर आज महाराजा मदरा मुंडा सेवा संस्थान न्यास ट्रस्ट के तत्वावधान में मुंडाओं के गढ़ सुतियांबे, पिठोरिया में महाराजा मदरा मुंडा की जयंती पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ अत्यंत श्रद्धा और भव्यता से मनाई गई।

कार्यक्रम की शुरुआत मुख्य पहान आदरणीय श्री प्रदीप पहान के नेतृत्व में डाक नगाड़ा, बाजा-गाजा और पारंपरिक वेशभूषा के साथ की गई। इसके बाद मुंडाओं के ऐतिहासिक 44 धार्मिक स्थलों—मरंगबुरू, कंमपार्ट, पिलचु हड़ाम, पिलचु बुढही, सूर्यमंडा, बाग-बाघिन, गढ़बाड़ी आदि—पर विधिवत पूजा-पाठ संपन्न हुआ।
रूढ़ि प्रथा के अनुसार संबंधित स्थलों पर बलि प्रथा का पालन किया गया। कंमपार्ट में भेड़ा, मरंगबुरू में बकरा, पिलचु हड़ाम व पिलचु बुढही में मुर्गी, तथा गढ़बाड़ी में मुर्गा-मुर्गी की बलि दी गई। वहीं जहाँ फूल-पत्ती का विधान है, वहाँ उसी के अनुरूप पूजा की गई। इसके पश्चात प्रसाद वितरण किया गया और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन पर सामूहिक नृत्य प्रस्तुत किया गया, जिससे क्षेत्र में उत्सव जैसा माहौल बन गया।
इस मौके पर संस्थान की अध्यक्षा श्रीमती बीना मुंडा व संरक्षक पहलवान सिंह मुंडा ने संयुक्त रूप से युवा पीढ़ी और आने वाली नस्लों से अपील की कि वे अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित पूजा पद्धति व रूढ़ि प्रथा को सहेजें और आगे बढ़ाएं। उन्होंने कहा जनजातीय समाज की असली पहचान उसकी कस्टम और परंपराएं हैं। जब तक हमारी रूढ़ि प्रथा जीवित है, तब तक हमारे हक और अधिकार भी सुरक्षित हैं। कस्टम रहेगा, तो जनजाति भी रहेगी, कस्टम नहीं रहेगा, तो जनजाति भी विलुप्त हो जाएगी।
कार्यक्रम को सफल बनाने में विमल पहान, झालो मुंडा, मुन्नी देवी, सुनीता मुंडा, शिवानी मुंडा, हेमंती मुंडा, जितेश्वर मुंडा, महेंद्र मुंडा, बलराम मुंडा, राजेंद्र पहान, रवि पहान, प्रवीण पहान, भवानी मुंडा, गणेश मुंडा, बालेश्वर पहान, रघु पहान, दीनू पहान, संदीप उरांव, सोमा उरांव, सुरेश उरांव, बाहा उरांव, शुकरा उरांव, प्रेमचंद पहान सहित कई लोगों का सराहनीय योगदान रहा।
कार्यक्रम के अंत में यह निर्णय लिया गया कि अगले वर्ष महाराजा मदरा मुंडा जयंती को और भी व्यापक स्तर पर मनाया जाएगा, जिससे जनजातीय संस्कृति को नई पीढ़ी तक और अधिक मजबूती से पहुँचाया जा सके।



