राजभवन मार्च में आदिवासियों की हुंकार, पेसा ड्राफ्टिंग में भागीदारी की मांग

Ranchi : राजधानी रांची की सड़कों पर आज लाल-सफेद झंडों और नारों की गर्जना गूंज उठी, जब हजारों की संख्या में आदिवासी समाज के लोग झारखंड बुद्धिजीवी मंच के नेतृत्व में पेसा कानून की मूल भावना की रक्षा के लिए राजभवन मार्च पर निकले। Also

राजभवन मार्च में आदिवासियों की हुंकार, पेसा ड्राफ्टिंग में भागीदारी की मांग
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Ranchi : राजधानी रांची की सड़कों पर आज लाल-सफेद झंडों और नारों की गर्जना गूंज उठी, जब हजारों की संख्या में आदिवासी समाज के लोग झारखंड बुद्धिजीवी मंच के नेतृत्व में पेसा कानून की मूल भावना की रक्षा के लिए राजभवन मार्च पर निकले।

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प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट रूप से कहा कि पेसा (PESA) कानून, जो आदिवासी समाज के स्वशासन और सांस्कृतिक अस्मिता का आधार है, उसकी ड्राफ्टिंग में गैर-आदिवासियों की भूमिका अस्वीकार्य है। उनका तर्क था कि जो लोग आदिवासी रीति-रिवाज, परंपरा और ग्रामसभा की संरचना को नहीं समझते, वे इस कानून की आत्मा को कैसे जीवित रख सकते हैं?

मार्च के दौरान राज्यपाल को एक ज्ञापन सौंपा गया, जिसमें प्रमुख मांगें रखी गईं:

  • पेसा कानून की मूल भावना से छेड़छाड़ न की जाए

  • ड्राफ्टिंग कमेटी में केवल मूलवासी आदिवासियों को शामिल किया जाए

  • ग्रामसभा की संप्रभुता को पूरी तरह मान्यता दी जाए

  • पूरे झारखंड में पेसा कानून तत्काल प्रभाव से लागू किया जाए

“पेसा हमारा अधिकार है”, “गैर-आदिवासी ड्राफ्टिंग बंद करो”, “ग्रामसभा सर्वोपरि है” जैसे नारों से राजपथ गूंज उठा। यह प्रदर्शन सिर्फ राजनीतिक विरोध नहीं था, बल्कि आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा की चेतावनी भी था।

झारखंड बुद्धिजीवी मंच के नेताओं ने साफ कहा कि यदि राज्य सरकार ने आदिवासी समाज की भावनाओं का सम्मान नहीं किया, तो यह आंदोलन जल्द ही राज्यव्यापी जन आंदोलन का रूप ले लेगा। उन्होंने यह भी कहा कि पेसा सिर्फ एक क़ानून नहीं, बल्कि आदिवासी आत्मनिर्भरता और स्वशासन का संवैधानिक औजार है।

राजभवन मार्च ने यह संदेश स्पष्ट कर दिया कि आदिवासी समाज अब सिर्फ पर्यवेक्षक नहीं, बल्कि नीति निर्माण में भागीदार बनना चाहता है। यह आंदोलन झारखंड की राजनीति और प्रशासनिक दृष्टिकोण को एक नई दिशा दे सकता है।

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