भारतीयों में बढ़ा परोपकार का जज़्बा, 540 अरब डॉलर पहुंचा दान का बाज़ार

नई दिल्ली: भारत में परोपकार और दान देने की परंपरा तेज़ी से मजबूत हो रही है और अब यह एक विशाल आर्थिक बाजार का रूप ले चुकी है। एक हालिया अध्ययन के अनुसार, देश में परोपकार का आकार वर्ष 2023 में 370 अरब डॉलर से

भारतीयों में बढ़ा परोपकार का जज़्बा, 540 अरब डॉलर पहुंचा दान का बाज़ार
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नई दिल्ली: भारत में परोपकार और दान देने की परंपरा तेज़ी से मजबूत हो रही है और अब यह एक विशाल आर्थिक बाजार का रूप ले चुकी है। एक हालिया अध्ययन के अनुसार, देश में परोपकार का आकार वर्ष 2023 में 370 अरब डॉलर से बढ़कर अब 540 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। यह बढ़ोतरी न केवल आर्थिक विकास को दर्शाती है, बल्कि समाज के प्रति नागरिकों की बढ़ती जिम्मेदारी और संवेदनशीलता को भी उजागर करती है।

यह खुलासा Centre for Social Impact and Philanthropy (CSIP) द्वारा जारी रिपोर्ट “How India Gives: 2025–26” में किया गया है, जो Ashoka University से संबद्ध है। रिपोर्ट बताती है कि भारत में दान का प्रवाह केवल बड़े कॉरपोरेट घरानों की CSR गतिविधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि आम परिवारों से होने वाला नियमित और गुमनाम दान इसकी रीढ़ है।

अमीरी नहीं, आदत है परोपकार

अध्ययन की सबसे प्रेरक बात यह है कि भारत में परोपकार केवल अमीरों तक सीमित नहीं है। 8,000 रुपये मासिक आय से कम वाले परिवारों में भी दान करने की प्रवृत्ति लगातार बनी हुई है। यहां तक कि 4,000–5,000 रुपये के न्यूनतम मासिक उपभोग स्तर वाले लगभग 50% परिवार नियमित रूप से दान करते हैं।
जैसे-जैसे आय और उपभोग स्तर बढ़ता है, दान में भागीदारी 70–80% तक पहुंच जाती है। यह धारणा टूटती है कि दान केवल विलासिता है—दरअसल यह भारतीय समाज की जड़ों में रची-बसी आदत है।

किस तरह करते हैं भारतीय दान

सर्वेक्षण के मुताबिक, करीब 68% भारतीय किसी न किसी रूप में परोपकारी गतिविधियों से जुड़े हैं:

  • 48% लोग वस्तु के रूप में दान करते हैं (भोजन, कपड़े, घरेलू सामान)

  • 44% लोग नकद दान करते हैं

  • 30% लोग स्वयंसेवक के रूप में समय और श्रम दान करते हैं

हालांकि धार्मिक संस्थाओं और जरूरतमंदों को प्रत्यक्ष सहायता अभी भी बड़ा हिस्सा है, लेकिन सामाजिक कारणों के लिए दान देने की प्रवृत्ति में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो समाज की परिपक्वता का संकेत है।

20 राज्यों में हुआ व्यापक सर्वे

यह अध्ययन देश के 20 राज्यों में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के 7,000 लोगों पर आधारित है। इसमें राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (NSS) के उपभोग डेटा का उपयोग कर रोजमर्रा के दानदाताओं की सटीक प्रोफाइल तैयार की गई।

आगे और बढ़ेगा दान का दायरा

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के तेजी से बढ़ते आर्थिक आकार और बढ़ते घरेलू उपभोग के साथ आने वाले वर्षों में रोजमर्रा का दान और अधिक संगठित व विस्तृत होगा। रिपोर्ट यह साबित करती है कि भारत का परोपकार मॉडल व्यक्तिगत करुणा और सामुदायिक जुड़ाव पर आधारित है, जहां हर वर्ग अपनी क्षमता के अनुसार समाज के उत्थान में योगदान दे रहा है।

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