जयंती विशेष : लोकगीतों से साहित्य तक अपनी भाषा-संस्कृति को दिलाई नई पहचान
लेखक : डॉ. ओहदार अनाम अजनबी
झारखंड की लोकसंस्कृति, भाषा और साहित्य को अपनी लेखनी व सुरीली आवाज से समृद्ध करने वाले सुकुमार खोरठा जगत की अमूल्य धरोहर हैं। उनका वास्तविक नाम सुरेश कुमार विश्वकर्मा था। बोकारो जिले के नावाडीह प्रखंड स्थित भेंडरा गांव में जन्मे सुकुमार ने अपनी प्रतिभा से खोरठा भाषा को व्यापक पहचान दिलाई।
सुकुमार की गायकी में गांवों की सोंधी खुशबू, खेत-खलिहानों की लय और आम जनजीवन के सुख-दुःख की झलक मिलती थी। ‘मंदर बाजे रे’, ‘बाँसी बाजे रे’ और ‘माय गो माय’ जैसे गीतों ने उन्हें जन-जन के बीच लोकप्रिय बनाया। आकाशवाणी, दूरदर्शन और विभिन्न सांस्कृतिक मंचों के माध्यम से उनकी आवाज दूर-दूर तक पहुंची।
वे केवल लोकगायक ही नहीं, बल्कि कवि, नाटककार, गीतकार और चित्रकार भी थे। उनके खोरठा नाटक ‘डाह’ को विशेष पहचान मिली। उनकी रचनाओं में सामाजिक सरोकार, लोकजीवन और सांस्कृतिक चेतना का अनूठा संगम दिखाई देता है।
सुकुमार ने साबित किया कि मातृभाषा में भी भावनाओं और जीवन के हर पहलू को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया जा सकता है। उनके गीतों में आज भी झारखंड की माटी की महक और खोरठा अस्मिता की गूंज सुनाई देती है। उनकी जयंती पर उन्हें याद करना अपनी भाषा, संस्कृति और जड़ों के प्रति सम्मान व्यक्त करना है।



