New Delhi : पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) से कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर तेज उछाल देखने को मिला। सोमवार को ब्रेंट क्रूड 90 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार करते हुए 90.73 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जो पिछले करीब डेढ़ महीने का उच्चतम स्तर है। वहीं, वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड भी 85 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया।
ब्रेंट क्रूड में 2.8 फीसदी से अधिक की तेजी
अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ने 2.60 डॉलर प्रति बैरल की बढ़त के साथ 90.70 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार की शुरुआत की। शुरुआती कारोबार में यह कुछ समय के लिए फिसलकर 89.91 डॉलर प्रति बैरल तक आया, लेकिन जल्द ही फिर 90 डॉलर के स्तर को पार करते हुए 90.73 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया।
भारतीय समयानुसार सुबह 11:15 बजे ब्रेंट क्रूड 2.48 डॉलर (2.81 प्रतिशत) की बढ़त के साथ 90.58 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था।
WTI क्रूड भी 85 डॉलर के पार
इसी तरह, डब्ल्यूटीआई क्रूड ने 2.14 डॉलर प्रति बैरल की तेजी के साथ 84.63 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार शुरू किया। कारोबार के दौरान यह कुछ समय के लिए 83.61 डॉलर प्रति बैरल तक फिसला, लेकिन बाद में तेजी लौटने पर 85.39 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया।
हालांकि बाद में इसमें हल्की गिरावट दर्ज की गई। भारतीय समयानुसार सुबह 11:15 बजे डब्ल्यूटीआई क्रूड 2.39 प्रतिशत की बढ़त के साथ 84.46 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था।
होर्मुज जलडमरूमध्य बना चिंता का कारण
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल की वैश्विक आपूर्ति पर संकट गहराने की आशंका बढ़ गई है।
फिनरेक्स ट्रेजरी एडवाइजर्स एलएलपी के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अनिल भंसाली के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने क्षेत्र में शांति की संभावनाओं को कमजोर कर दिया है। इसके चलते होर्मुज जलडमरूमध्य से कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने की आशंका ने बाजार की चिंता बढ़ा दी है।
उन्होंने बताया कि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से होता है। विशेष रूप से खाड़ी देशों से होने वाली 70 प्रतिशत से अधिक तेल आपूर्ति होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरती है। ऐसे में इस मार्ग में किसी भी तरह का व्यवधान वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर सकता है, जिसका असर सीधे तेल की कीमतों पर दिखाई दे रहा है।
भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है असर
अनिल भंसाली ने कहा कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए चिंता का विषय हैं। इससे चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) बढ़ सकता है और राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) के लक्ष्य पर भी दबाव पड़ सकता है।
इसके अलावा महंगे कच्चे तेल से रुपये पर दबाव बढ़ने, महंगाई में तेजी आने और विदेशी निवेश के बाहर जाने (Capital Outflow) का जोखिम भी बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में सरकार को सब्सिडी, ब्याज दरों और रुपये-डॉलर विनिमय दर से जुड़े मोर्चों पर महत्वपूर्ण नीतिगत फैसले लेने पड़ सकते हैं।



