Ranchi : विकास के दावों की ज़मीनी हकीकत बयां करती रातू प्रखंड की मलमाडू चौक से तारूप गांव तक की सड़क आज भी अधूरी है। एक साल पहले लोकसभा चुनाव के वक्त रांची के तत्कालीन सांसद और विधानसभा चुनाव के ठीक पहले नव-निर्वाचित विधायक ने इसका शिलान्यास किया था। लेकिन वादे हवा हो गए—अब न शिलापट्ट बचा है, न सड़क का नामोनिशान।

कीचड़-गड्ढों से होकर गुजर रही जिंदगी –
यह सड़क बीस गांवों को जोड़ती है और हजारों लोगों की ज़िंदगी से जुड़ी है। बारिश के मौसम में यह रास्ता जानलेवा साबित हो रहा है। ग्रामीणों के मुताबिक, गर्भवती महिलाओं, बीमार और बुजुर्गों को अस्पताल पहुंचाना चुनौती बन गया है। हर दिन लोग पत्थरों और कीचड़ से जूझ रहे हैं।
तारूप गांव में सड़क नहीं, खतरा बिछा है –
ग्रामीणों ने बताया कि तारूप की ओर से बार-बार सड़क पर ईंट, बालू और चिप्स गिरा दिए जाते हैं। इससे दुर्घटनाओं का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। बुजुर्ग कहते हैं, बालू की मिट्टी कई दिनों तक सड़क पर पड़ी रहती है, पैदल चलना भी कठिन हो गया है।
अतिक्रमण ने घटाई चौड़ाई, बढ़ाई परेशानी –
आरयू द्वारा पहले नापी गई सड़क की चौड़ाई 19 फीट थी। अब सरकारी जमीन पर कब्जा कर कच्चे-पक्के मकान और शौचालय बना लिए गए हैं। इससे सड़क संकरी हो गई है और ट्रैफिक की रफ्तार थम गई है।
बच्चों की शिक्षा पर भारी पड़ी जर्जर सड़क
छात्र-छात्राओं को स्कूल पहुंचने में घंटों लग जाते हैं। साइकिलें पत्थरों में उलझ जाती हैं और बच्चे थक कर स्कूल पहुंचते हैं। यह जर्जर सड़क शिक्षा के रास्ते में भी बड़ी बाधा बन चुकी है।
प्रशासन को चेतावनी: नहीं सुधरे तो आंदोलन तय
गांव वालों का गुस्सा अब सड़कों पर उतरने को तैयार है। चेतावनी दी गई है कि यदि जल्द से जल्द सड़क का निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ, तो वे उग्र आंदोलन छेड़ देंगे।
विकास की प्रतीक्षा में दम तोड़ती –
उषामतातू से तारूप तक की यह सड़क आज विकास की प्रतीक्षा में दम तोड़ रही है। वादों के पत्थर तोड़ दिए गए, अब धैर्य की दीवारें भी दरकने लगी हैं। क्या प्रशासन अब जागेगा?


