- खूंटी जिले में पुलों और पारिस्थितिकी तंत्र को भी नुकसान
Khunti : जिले में लगातार हो रहे अवैध और अंधाधुंध बालू उत्खनन से न केवल नदियों के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं, बल्कि कई पुलों के ध्वस्त होने का भी खतरा उत्पन्न हो गया है।
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बनई नदी नाले में तब्दील
खूंटी-तोरपा मार्ग पर स्थित बनई नदी अब अवैध बालू उत्खनन के कारण नाले में तब्दील हो चुकी है। इस नदी में अब सिर्फ घास नजर आती है। यह वही नदी है, जहां सावन और अन्य धार्मिक अवसरों पर श्रद्धालु स्नान कर बाबा आम्रेश्वर धाम में जलाभिषेक के लिए पवित्र जल ले जाते थे। अब स्थिति यह है कि बारिश के समय को छोड़कर नदी लगभग सूखी रहती है।
तोरपा की चेंगरझोर, छाता, कारो सहित कई अन्य छोटी नदियों का भी अस्तित्व संकट में है। यदि समय रहते इस पर रोक नहीं लगी, तो ये नदियां भी इतिहास बन जाएंगी।
कारो नदी पर पुल ध्वस्त
तोरपा थाना क्षेत्र के अम्मापकना-गोविंदपुर रोड पर स्थित कारो नदी पर बना पुल कुछ वर्षों पहले अवैध रेत खनन के कारण ध्वस्त हो गया था। इसका खामियाजा आज भी स्थानीय लोग भुगत रहे हैं। खूंटी-सिमडेगा रोड पर कारो नदी पुल के नीचे से भी अवैध रूप से बालू का उत्खनन जारी है, जिससे पुल की संरचना को खतरा है।
हालांकि यह क्षेत्र खनन के लिए पूरी तरह से प्रतिबंधित है, लेकिन इसके बावजूद पुल के खंभे से महज 200–300 मीटर की दूरी पर धड़ल्ले से खनन कार्य हो रहा है। पुल के पूर्वी दिशा में 500 मीटर के भीतर बड़े पैमाने पर बालू निकाला जा चुका है। स्थानीय लोगों का कहना है कि शाम ढलते ही अवैध उत्खनन शुरू हो जाता है, जिससे सरकार को प्रति माह लाखों रुपये के राजस्व की हानि हो रही है।
“पानी का फिक्स्ड डिपोजिट होता है बालू” — डॉ. नीतीश प्रियदर्शी
झारखंड के पर्यावरणविद् और रांची विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. नीतीश प्रियदर्शी ने नदियों से अवैज्ञानिक और अंधाधुंध बालू निकासी पर गहरी चिंता जताई है। उन्होंने कहा, “बालू नदियों के पानी का फिक्स्ड डिपोजिट होता है। बरसात के पानी को बालू ही जमा रखता है। जब हम बालू निकाल लेंगे, तो नदियां सूख जाएंगी।”
उन्होंने बताया कि जब बारिश नहीं होती है, तब बालू में जमा पानी ही नदियों को रिचार्ज करता है। पहले के लोग बालू हटाकर पानी पीते थे और मवेशियों के लिए नदी में गड्ढे बनाते थे। डॉ. प्रियदर्शी ने यह भी कहा कि नदियों के किनारों और मुड़ाव के स्थानों से बालू का उत्खनन नहीं होना चाहिए, और यदि हो तो केवल एक निश्चित सीमा में ही।
उन्होंने चेतावनी दी कि अवैज्ञानिक उत्खनन के कारण रांची की जुमार नदी पूरी तरह से समाप्त हो चुकी है, और यही हाल अन्य नदियों का भी हो सकता है यदि जल्द कदम नहीं उठाए गए।

