‘आदिवासी पहचान’ पर मेघा उरांव का तीखा प्रहार, बोले—दोहरे मापदंड की नीति नहीं चलेगी

WhatsApp Group जुड़ने के लिए क्लिक करें 👉 Join Now सरना आस्था, मसना-चाला, जाहेर थान, अखड़ा और धूमकुड़िया हैं आदिवासी पहचान के आधार : मेघा उरांव मुकेश रंजन Ranchi : झारखंड आदिवासी सरना विकास समिति, धुर्वा के अध्यक्ष मेघा उरांव ने आदिवासी पहचान, आस्था और

‘आदिवासी पहचान’ पर मेघा उरांव का तीखा प्रहार, बोले—दोहरे मापदंड की नीति नहीं चलेगी
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  • सरना आस्था, मसना-चाला, जाहेर थान, अखड़ा और धूमकुड़िया हैं आदिवासी पहचान के आधार : मेघा उरांव

मुकेश रंजन
Ranchi : झारखंड आदिवासी सरना विकास समिति, धुर्वा के अध्यक्ष मेघा उरांव ने आदिवासी पहचान, आस्था और संस्कृति को लेकर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि आदिवासियों की पहचान केवल जल, जंगल और जमीन तक सीमित नहीं है, बल्कि उनकी धार्मिक आस्था, सामाजिक व्यवस्था, परंपराएं और सामुदायिक जीवन भी उनकी पहचान का अभिन्न हिस्सा हैं।

मेघा उरांव ने कहा कि सरना, मसना-चाला, जाहेर थान, मांझी थान, पहान-पुजार, नायके, अखड़ा, धूमकुड़िया और पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था आदिवासी समाज की विशिष्ट पहचान हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जो संस्थाएं और लोग आदिवासी समाज की पहचान, संरक्षण और संवर्धन की बात करते हैं, क्या वे वास्तव में आदिवासी समाज की मूल आस्था, पूजा-पद्धति और परंपरागत सामाजिक व्यवस्था को उसी रूप में स्वीकार और संरक्षित करते हैं?

उन्होंने कहा कि एक ओर आदिवासी समाज की आस्था और पारंपरिक पूजा-पद्धति को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है और दूसरी ओर आदिवासी पहचान एवं संस्कृति के संरक्षण की बात की जा रही है। यह दोहरा रवैया आदिवासी समाज स्वीकार नहीं करेगा।

मेघा उरांव ने पुरुलिया रोड स्थित बिशप हाउस, एसडीसी सभागार और नामकुम बगीचा में होने वाली बैठकों का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे मंचों से आदिवासी पहचान, संरक्षण, संवर्धन और विस्तार की बातें करना विरोधाभासपूर्ण है। उन्होंने कहा कि “दूध की रखवाली बिल्ली से” वाली कहावत ऐसे विरोधाभास पर पूरी तरह चरितार्थ होती है।

उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की पहचान और अस्तित्व को लेकर किसी भी प्रकार की चर्चा हो तो उसमें आदिवासी समाज की परंपरागत आस्था, सामाजिक संगठन, सामुदायिक जीवन और सांस्कृतिक संस्थाओं को केंद्र में रखना होगा। केवल शब्दों में संरक्षण की बात करने से आदिवासी संस्कृति और पहचान सुरक्षित नहीं होगी।

मेघा उरांव ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आदिवासी समाज की पहचान को लेकर दोहरी नीति और दोहरे मापदंड अब नहीं चलेंगे। उन्होंने समाज के लोगों से अपनी पारंपरिक आस्था, संस्कृति, रीति-रिवाज और सामाजिक व्यवस्था के संरक्षण के लिए एकजुट होने का आह्वान किया।

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