नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 25 साल के सार्वजनिक जीवन को केंद्र में रखते हुए भाजपा 17 सितंबर से एक महीने तक ‘सेवा संकल्प अभियान’ चलाने की तैयारी में है। 17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन है और पार्टी हर वर्ष इस अवसर पर अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित करती है। लेकिन इस बार अभियान का राजनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि अगले वर्ष कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इनमें उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य भी शामिल हैं, जहां का चुनाव 2029 के लोकसभा चुनाव की राजनीतिक जमीन तैयार करने में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भाजपा की रणनीति इस बार केवल जन्मदिन समारोह तक सीमित नहीं रहने वाली है। सेवा, सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों से संपर्क, युवाओं के साथ संवाद और संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करने के जरिए पार्टी आगामी चुनावी चुनौतियों का सामना करने की तैयारी कर रही है।
‘आशीर्वाद का दीया’ से शुरू होगा सेवा अभियान
प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन पर देशभर में ‘आशीर्वाद का दीया’ कार्यक्रम आयोजित किए जाने की योजना है। इसके तहत सरकारी योजनाओं का लाभ पाने वाले लोग प्रधानमंत्री के प्रति आभार व्यक्त करते हुए दीप जलाएंगे। इस कार्यक्रम के माध्यम से विकसित भारत के संकल्प को भी दोहराने का प्रयास किया जाएगा। भाजपा के लिए यह कार्यक्रम सरकार की योजनाओं और उनके लाभार्थियों के बीच राजनीतिक संवाद मजबूत करने का माध्यम भी बन सकता है। पार्टी यह संदेश देने की कोशिश करेगी कि केंद्र और राज्य सरकारों की योजनाओं का लाभ समाज के अलग-अलग वर्गों तक पहुंच रहा है।
‘सेवा ज्योति कलश’ यात्रा से गांवों तक पहुंचेगी भाजपा
एक महीने तक चलने वाले अभियान में ‘सेवा ज्योति कलश’ यात्रा भी प्रस्तावित है। इसके तहत अलग-अलग क्षेत्रों में पदयात्रा, साइकिल यात्रा और मोटरसाइकिल यात्रा जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। प्रखंड स्तर पर सेवा सेतु शिविर लगाए जाने की भी योजना है। इन शिविरों के जरिए सरकारी योजनाओं से वंचित लोगों की पहचान कर उन्हें योजनाओं का लाभ दिलाने पर जोर दिया जाएगा। इस पूरी कवायद का एक बड़ा उद्देश्य संगठन को जमीन पर सक्रिय करना है। चुनाव से पहले पार्टी कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ाने और आम लोगों से सीधा संपर्क मजबूत करने की कोशिश के तौर पर इसे देखा जा रहा है।
वडनगर से वाराणसी तक युवाओं से संवाद
भाजपा ने युवाओं को भी इस अभियान का अहम हिस्सा बनाया है। पार्टी की 20 युवा टीमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मस्थान वडनगर से उनके संसदीय क्षेत्र वाराणसी तक युवाओं से संवाद करेंगी। युवाओं के बीच यह संपर्क अभियान कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। बेरोजगारी, शिक्षा, रोजगार, तकनीक और भविष्य की संभावनाओं जैसे मुद्दों को लेकर युवाओं के बीच राजनीतिक बहस लगातार तेज हुई है। ऐसे में भाजपा संगठनात्मक स्तर पर युवा मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश करेगी।
उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा
आगामी विधानसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती माना जा रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में राज्य में भाजपा के प्रदर्शन में गिरावट देखने को मिली थी। इसके बाद 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सभी प्रमुख दलों ने अपनी रणनीति तैयार करनी शुरू कर दी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा सरकार कानून-व्यवस्था और विकास को अपनी प्रमुख उपलब्धियों के रूप में पेश कर सकती है। दूसरी तरफ विपक्ष जातीय समीकरण, सामाजिक गठजोड़ और स्थानीय मुद्दों के आधार पर भाजपा को घेरने की कोशिश करेगा।
सपा-कांग्रेस गठबंधन पर नजर
समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच संभावित तालमेल उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति का अहम पहलू बन सकता है। विपक्षी दलों के बीच सीट बंटवारा यदि समय रहते तय नहीं हुआ तो इसका असर चुनावी समीकरण पर पड़ सकता है। सपा अपने पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) समीकरण को मजबूत करने में जुटी है। वहीं कांग्रेस भी राज्य में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है। दोनों दलों के बीच बेहतर तालमेल हुआ तो भाजपा के सामने चुनौती बढ़ सकती है। हालांकि विपक्ष के सामने भी कई मुश्किलें हैं। सपा को अपने पुराने शासन की छवि और कानून-व्यवस्था से जुड़े विपक्षी आरोपों का जवाब देना होगा। वहीं कांग्रेस को संगठनात्मक कमजोरी और सीमित विधानसभा प्रतिनिधित्व से आगे निकलने की चुनौती है।
दलित और पिछड़ा वोट बनेगा निर्णायक
उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की कमजोर होती राजनीतिक स्थिति ने दलित वोटों के समीकरण को भी चर्चा के केंद्र में ला दिया है। चुनाव में दलित मतदाताओं का रुख किस ओर जाता है, इसका असर कई सीटों पर पड़ सकता है। भाजपा की कोशिश गैर-यादव पिछड़े वर्ग और दलित मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ बनाए रखने की होगी। दूसरी ओर सपा पीडीए के जरिए सामाजिक आधार का विस्तार करना चाहती है। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश का चुनाव केवल भाजपा बनाम सपा-कांग्रेस मुकाबला नहीं होगा। बसपा, छोटे क्षेत्रीय दल और अन्य राजनीतिक समूह भी कई सीटों पर समीकरण बदल सकते हैं।
महिला वोटरों पर भी बढ़ेगा फोकस
महिला मतदाताओं को लेकर भी राजनीतिक दलों की घोषणाएं महत्वपूर्ण होती जा रही हैं। अखिलेश यादव की ओर से महिलाओं को आर्थिक सहायता देने की घोषणा के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार की ओर से स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं के लिए ब्याजमुक्त ऋण की घोषणा को भी चुनावी रणनीति के लिहाज से देखा जा रहा है। महिला मतदाताओं के बीच सरकारी योजनाओं का लाभ, आर्थिक सहायता, रोजगार और सुरक्षा जैसे मुद्दे आने वाले चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
मायावती और नए सामाजिक समीकरण
बहुजन समाज पार्टी भी अपनी रणनीति में बदलाव करती दिखाई दे रही है। मायावती ने युवा नेतृत्व और सामाजिक समीकरण को लेकर नए प्रयोग किए हैं। पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पारंपरिक दलित वोट बैंक को मजबूत बनाए रखने की है। इसी बीच छोटे दलों और विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच संभावित गठजोड़ भी चुनावी गणित को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि इन गठबंधनों की वास्तविक ताकत चुनाव के दौरान सीटवार समीकरण सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगी।
भाजपा के सामने सवर्ण मतदाताओं को साधने की चुनौती
भाजपा के लिए एक अन्य चुनौती सवर्ण मतदाताओं के बीच किसी भी तरह की नाराजगी को दूर करना हो सकती है। आरक्षण, यूजीसी से जुड़े मुद्दों और एससी-एसटी कानून जैसे विषयों को लेकर कुछ वर्गों में असंतोष की चर्चा राजनीतिक हलकों में होती रही है। भाजपा की चुनौती यह होगी कि उसका पारंपरिक समर्थन आधार किसी अन्य दल की ओर न जाए और नाराजगी का असर मतदान प्रतिशत या नोटा के रूप में सामने न आए।
2027 के चुनाव की तैयारी अभी से तेज
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव भले ही अभी समय दूर हों, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। भाजपा के लिए संगठन को मजबूत करना, लाभार्थियों तक पहुंच बढ़ाना और युवाओं के साथ संवाद स्थापित करना अहम होगा। विपक्ष के लिए जातीय और सामाजिक समीकरण को एकजुट रखना बड़ी चुनौती होगी। सपा-कांग्रेस के बीच सीट बंटवारा, बसपा की रणनीति और छोटे दलों के रुख से चुनावी समीकरण लगातार बदल सकते हैं।
यूपी चुनाव तय करेगा आगे की राजनीतिक दिशा
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को केवल राज्य की सत्ता का चुनाव मानना मुश्किल है। देश की राजनीति में उत्तर प्रदेश की बड़ी भूमिका को देखते हुए 2027 का परिणाम 2029 के लोकसभा चुनाव की तैयारियों और राजनीतिक नैरेटिव पर भी असर डाल सकता है। इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन से शुरू होने वाला सेवा संकल्प अभियान भाजपा के लिए केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि संगठन को सक्रिय करने और जनता के बीच अपनी मौजूदगी मजबूत करने का अवसर भी है। अब असली परीक्षा यह होगी कि सेवा और संगठन के इस अभियान को भाजपा कितनी प्रभावी तरीके से चुनावी जमीन पर बदल पाती है।



