पूर्वी सिंहभूम। झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले में एक अनोखी और परंपरागत रस्म ने लोगों का ध्यान खींचा है। शहर के उलीडीह थाना क्षेत्र अंतर्गत शंकोसाई रोड नंबर-5 की बस्ती में मागे पर्व के अंतिम दिन हरमंगेया अवसर पर हो समाज की सदियों पुरानी परंपरा के तहत दो छोटे बच्चों का प्रतीकात्मक विवाह कुतिया से कराया गया।
क्यों कराया जाता है ऐसा विवाह?
समाज के बुजुर्गों के अनुसार, यदि किसी बच्चे के ऊपरी दांत पहले निकल आते हैं, तो इसे अशुभ संकेत माना जाता है। मान्यता है कि इससे भविष्य में अनहोनी या दुर्घटना की आशंका रहती है। ऐसे में ग्रह दोष से मुक्ति और बच्चे की सुरक्षा के लिए कुत्ते या कुतिया से प्रतीकात्मक विवाह कराया जाता है। विश्वास है कि इससे अशुभ ग्रहों का प्रभाव समाप्त हो जाता है।
धूमधाम से निकली बारात
इस अवसर पर अजय हेंब्रम के चार वर्षीय पुत्र रुपेश हेंब्रम और लक्ष्मण सोय के दो वर्षीय पुत्र सूर्य सोय की अलग-अलग बारात निकाली गई। ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज के बीच बच्चों को पारंपरिक वेशभूषा में सजाया गया। परिजन और ग्रामीण नाचते-गाते बारात में शामिल हुए, जिससे पूरे इलाके में उत्सव का माहौल बन गया।
पूरी हुईं सभी पारंपरिक रस्में
विवाह से पहले समधी मिलन, मंगनी, हल्दी और पांव पूजा जैसी सभी परंपरागत रस्में निभाई गईं। महिलाओं ने मंगलगीत गाए और बुजुर्गों ने विधि-विधान से पूजा कराई। इसके बाद साड़ पेड़ के नीचे विवाह की मुख्य रस्म संपन्न कराई गई।
साड़ पेड़ से जुड़ी मान्यता
हो समाज की मान्यता है कि साड़ पेड़ में विशेष आध्यात्मिक शक्ति होती है। उसके नीचे विवाह कराने से बच्चों का ग्रह दोष पेड़ अपने ऊपर ले लेता है, जिससे दोष समाप्त हो जाता है और बच्चों का भविष्य सुरक्षित रहता है। यह परंपरा आज भी हो समाज के कुछ परिवारों में आस्था और विश्वास के साथ निभाई जाती है।



