News Delhi : केंद्र सरकार द्वारा जारी नए आदेश के बाद देशभर में यह बहस तेज हो गई है कि संचार साथी ऐप वास्तव में डिजिटल सुरक्षा का साधन है या व्यापक निगरानी का नया औजार। सरकार ने 28 नवंबर 2025 को अधिसूचना जारी करके कहा है कि अगले 90 दिनों के भीतर यह ऐप सभी भारतीय स्मार्टफोनों में अनिवार्य रूप से इंस्टॉल कर दिया जाएगा और इसे न हटाया जा सकेगा, न डिसेबल किया जा सकेगा।
आदेश के अनुसार, मार्च 2026 से हर नया स्मार्टफोन—देशी हो या आयातित—इस ऐप के साथ प्री-इंस्टॉल आएगा। वहीं पुराने फोन में सॉफ़्टवेयर अपडेट के माध्यम से ऐप डाउनलोड कराया जाएगा। सरकार का दावा है कि यह कदम मोबाइल फ्रॉड रोकने, चोरी के फोन ब्लॉक करने, फर्जी IMEI पकड़ने और अनधिकृत सिम बंद करने के लिए आवश्यक है।
विशेषज्ञों की चिंता: निगरानी बढ़ने का खतरा
तकनीकी विशेषज्ञों का कहना है कि यह ऐप फोन के लगभग हर डेटा तक पहुंच सकता है—
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IMEI नंबर
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कॉल लॉग
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लोकेशन हिस्ट्री
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डिवाइस आइडेंटिफायर
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बैकग्राउंड एक्टिविटी
इससे नागरिकों की गोपनीयता, आवाजाही, संपर्कों और व्यक्तिगत आदतों पर निरंतर निगरानी संभव हो जाएगी। उन्होंने सवाल उठाया है कि जब पहले से ही CEIR पोर्टल और वेब-आधारित संचार साथी मौजूद है, तो हर फोन में जबरन ऐप डालने की क्या जरूरत है?
डेटा सुरक्षा पर शंका
देश में पिछले कुछ महीनों में कई डेटा लीक के मामले सामने आए हैं, जिनमें वेबसाइटों पर मोबाइल नंबर, आधार नंबर, पैन विवरण जैसी निजी जानकारी उपलब्ध होने के दावे किए गए। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में अभी कोई स्वतंत्र डेटा ऑडिट व्यवस्था या कठोर डेटा सुरक्षा कानून नहीं है, ऐसे में नागरिकों का भरोसा कमजोर पड़ना स्वाभाविक है।
लोकतांत्रिक ढांचे पर असर की आशंका
निगरानी को लेकर विपक्ष और नागरिक अधिकार समूहों ने आशंका जताई है कि इससे—
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पत्रकार,
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विपक्षी नेता,
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सामाजिक कार्यकर्ता,
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और आम नागरिक
सभी की गतिविधियां सरकार की सीधी निगरानी में आ सकती हैं। कई विशेषज्ञ इस ऐप की तुलना रूस के MAX ऐप और चीन के बैकडोर सिस्टम से कर रहे हैं, जहां नागरिकों की निजता बेहद सीमित है।
साइबर सुरक्षा या डिजिटल नियंत्रण?
विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि एक अनिवार्य सरकारी ऐप एक विशाल अटैक सरफेस भी बन जाता है। यदि यह हैक हुआ, तो करोड़ों लोगों का डेटा एक साथ खतरे में पड़ सकता है।
सरकार का दावा है कि उद्देश्य केवल सुरक्षा बढ़ाना है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह कदम नागरिकों को डिजिटल हथकड़ी पहनाने जैसा है। आने वाले समय में यह निर्णय भारतीय नागरिकों की डिजिटल स्वतंत्रता को किस तरह प्रभावित करेगा, इस पर बहस जारी है।


