- रिम्स-2 के लिए प्रस्तावित भूमि पर ग्रामीणों की बैठक, बोले—जमीन दी नहीं तो मुआवजा लेने का सवाल ही नहीं
मुकेश रंजन
Ranchi : रिम्स-2 के निर्माण के लिए प्रस्तावित भूमि को लेकर नगड़ी के ग्रामीण रैयतों का आक्रोश गुरुवार को बैठक में खुलकर सामने आया। जमीन बचाओ संघर्ष समिति के बैनर तले हुई बैठक में रैयतों ने अपने-अपने विचार रखे और कहा कि वे वर्षों से प्रस्तावित जमीन के अधिग्रहण का विरोध करते आ रहे हैं। ग्रामीणों का दावा है कि उन्होंने अपनी जमीन के बदले कभी मुआवजा लिया ही नहीं। इसके बावजूद सरकार की ओर से किसानों को मुआवजा दिए जाने की बात कही जा रही है।
‘जमीन नहीं दी तो मुआवजा कैसे ले लिया?’
बैठक में ग्रामीणों ने सबसे बड़ा सवाल यही उठाया कि जब किसानों ने जमीन अधिग्रहण के लिए सहमति नहीं दी और मुआवजा भी नहीं लिया, तो सरकारी रिकॉर्ड में मुआवजा भुगतान कैसे दर्ज हो गया? रैयतों ने आशंका जताई कि कहीं किसानों के नाम पर कागजी प्रक्रिया पूरी कर मुआवजा राशि में अनियमितता तो नहीं की गई। उन्होंने पूरे मामले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच कराने की मांग की।
ग्रामीणों का कहना था कि वर्ष 2012 में भी सरकार ने किसानों से बातचीत के लिए उच्चस्तरीय समिति गठित की थी। समिति के स्तर से किसानों को मुआवजा देने की बात कही गई थी, लेकिन रैयतों ने जमीन देने से इनकार कर दिया था। उनका स्पष्ट कहना था कि उन्हें अपनी जमीन के बदले मुआवजा नहीं चाहिए, बल्कि वे अपनी जमीन पर अपना अधिकार बनाए रखना चाहते हैं।
अब सरकार की ओर से यह कहना कि किसानों ने मुआवजा ले लिया है, ग्रामीणों के लिए बड़ा सवाल बन गया है। रैयतों ने कहा कि यदि मुआवजा दिया गया है तो किस किसान को, कितनी राशि और किस दस्तावेज के आधार पर भुगतान किया गया—इसका पूरा विवरण सार्वजनिक किया जाए।
पुलिस के जरिए दबाव बनाने का आरोप
बैठक में ग्रामीणों ने जमीन के मुद्दे पर पुलिस बल के इस्तेमाल का भी आरोप लगाया। उनका कहना था कि किसानों के बीच भय का माहौल बनाया जा रहा है, ताकि वे अपने हक और अधिकार की आवाज नहीं उठा सकें। कुछ ग्रामीणों ने पुलिसकर्मियों पर अभद्र व्यवहार और जातिसूचक टिप्पणी करने के भी आरोप लगाए। ग्रामीणों ने इन आरोपों की निष्पक्ष जांच कराने तथा दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की मांग की।
‘जमीन सिर्फ संपत्ति नहीं, हमारी पहचान है’
नगड़ी जमीन बचाओ संघर्ष समिति के सदस्यों ने कहा कि किसानों के लिए जमीन केवल संपत्ति नहीं, बल्कि रोजगार, आजीविका, सामाजिक पहचान और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य है। इसलिए जमीन अधिग्रहण से जुड़े किसी भी निर्णय में रैयतों के अधिकार और कानून की प्रक्रिया का पूरी तरह पालन होना चाहिए।
समिति ने मांग की कि रिम्स-2 के लिए प्रस्तावित भूमि से संबंधित पुराने अधिग्रहण दस्तावेज, मुआवजा भुगतान के अभिलेख, लाभुकों की सूची और भुगतान की पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक की जाए। यदि किसी किसान के नाम पर बिना उसकी जानकारी के मुआवजा भुगतान किया गया है, तो इसकी स्वतंत्र जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
‘हक की जमीन के लिए आखिरी दम तक लड़ेंगे’
बैठक में ग्रामीणों ने कहा कि वे किसी विकास योजना के विरोधी नहीं हैं, लेकिन विकास के नाम पर उनके अधिकारों की अनदेखी स्वीकार नहीं की जाएगी। रैयतों ने कहा कि वे अपनी जमीन और अधिकारों की रक्षा के लिए लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष जारी रखेंगे।


