Ranchi: झारखंड की आत्मा अब करवट ले रही है। सदियों से उपेक्षित, मगर अपनी संस्कृति और धरती से गहराई से जुड़ा आदिवासी समाज अब स्वाभिमान की ज्वाला में पुनः जाग उठा है। इसी चेतना की ऐतिहासिक दस्तक है—पाहन महा सम्मेलन, जो पहली बार झारखंड में एक विराट सांस्कृतिक क्रांति के रूप में आयोजित हो रहा है।
Also Read : ट्रॉली बैग में मिला शव, नवादा से जुड़ा मर्डर केस
इस आयोजन को लेकर आदिवासी चिंतक और जननेता सोमा उरांव ने अपने प्रखर विचारों से हलचल मचा दी। उनके शब्द न सिर्फ तीखे थे, बल्कि हजारों दिलों की धड़कनों के साथ गूंजते हुए लगे।
अगर किसी में आदिवासियों का सम्मान करने की ताक़त नहीं है, तो उन्हें रोकने की भी औक़ात नहीं होनी चाहिए।
अब वक़्त आ गया है कि हर कोई स्पष्ट करे। वह असली आदिवासी है या सिर्फ दिखावटी इसाई।
पाहन परंपरा के प्रहरी:
पाहन सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, एक परंपरा, एक भावना और एक सांस्कृतिक शक्ति का नाम है। गाँवों के आध्यात्मिक नेता, प्रकृति के उपासक, और समाज की आत्मा ,पाहन आज अपने सम्मान की प्रतीक्षा नहीं, उसका उद्घोष करने मैदान में उतर चुके हैं।
सम्मेलन की भव्य झलकियाँ :
- पारंपरिक वेशभूषा में हज़ारों पाहनों की दिव्य उपस्थिति।
- आदिवासी पूजा-पद्धति, प्रकृति आराधना और लोकदेवियों का जीवंत मंचन।
- पहचान, धर्मांतरण और सांस्कृतिक संघर्ष पर विचार रखेंगे प्रखर वक्ता।
- युवाओं में सांस्कृतिक गौरव और नेतृत्व चेतना का संचार।
- एक सम्मेलन नहीं, आदिवासी आत्मा की हुंकार :
यह आयोजन अब केवल सांस्कृतिक नहीं, एक ऐतिहासिक आंदोलन में बदल चुका है। सोमा उरांव की वाणी आदिवासी समाज के भीतर सुलग रहे असंतोष को शब्द देती है स्पष्ट, निर्भीक और निर्णायक।
झारखंड जाग चुका है, पाहन खड़े हो चुके हैं, अब कोई ताक़त नहीं जो इस चेतना को रोक सके।



