नागपुरी उपन्यास ‘सातो नदी पार’ का अंग्रेजी अनुवाद लोकार्पित, पद्मश्री महावीर नायक का सम्मान

Ranchi : रांची विश्वविद्यालय के मास कम्युनिकेशन विभाग में नागपुरी साहित्य एवं संस्कृति को समर्पित एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर नागपुरी भाषा की प्रसिद्ध लेखिका डॉ. शकुंतला मिश्र द्वारा लिखित उपन्यास ‘सातो नदी पार’ के अंग्रेजी अनुवाद ‘Across the River

नागपुरी उपन्यास ‘सातो नदी पार’ का अंग्रेजी अनुवाद लोकार्पित, पद्मश्री महावीर नायक का सम्मान

Ranchi : रांची विश्वविद्यालय के मास कम्युनिकेशन विभाग में नागपुरी साहित्य एवं संस्कृति को समर्पित एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर नागपुरी भाषा की प्रसिद्ध लेखिका डॉ. शकुंतला मिश्र द्वारा लिखित उपन्यास ‘सातो नदी पार’ के अंग्रेजी अनुवाद ‘Across the River Sato’ का लोकार्पण किया गया। इस अनुवाद कार्य को डॉ. किरण मिश्र ने संपन्न किया है, जिसका प्रकाशन कनाडा स्थित कैनेडियन सेंटर फॉर माइंडफुल हैबिटेट्स द्वारा किया गया है।

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कार्यक्रम का आयोजन नागपुरी साहित्य संस्कृति मंच के तत्वावधान में हुआ, जिसमें रांची विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. डी.के. सिंह मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि “डॉ. किरण मिश्र के प्रयासों से नागपुरी भाषा को अब वैश्विक स्तर पर एक नई पहचान मिल रही है, जो क्षेत्रीय साहित्य के लिए अत्यंत सराहनीय है।”

इस अवसर पर प्रसिद्ध लोकगायक पद्मश्री महावीर नायक का भी सम्मान किया गया। उन्हें वर्ष 2023 में ‘अमृत सम्मान’ और वर्ष 2025 में भारत सरकार द्वारा ‘पद्मश्री’ सम्मान से नवाज़ा गया है। समारोह में उनकी लोकसंगीत के प्रति समर्पित साधना और योगदान को याद किया गया।

वरिष्ठ नागपुरी साहित्यकार और पद्मश्री सम्मानित मधु मंसूरी हंसमुख ने इस उपन्यास के अनुवाद को नागपुरी साहित्य के लिए एक मील का पत्थर बताया। उन्होंने कहा कि “जब किसी क्षेत्रीय भाषा का साहित्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पढ़ा और सराहा जाए, तो यह पूरे समुदाय के लिए गौरव की बात होती है।”

कार्यक्रम में डॉ. उमेश नंद तिवारी, डॉ. सुदेश साहू, डॉ. बी.के. झा, अवधमणि पाठक समेत विश्वविद्यालय के सैकड़ों विद्यार्थी, शिक्षक और गणमान्य लोग शामिल हुए। सभी ने नागपुरी साहित्य को नई ऊँचाई पर पहुंचाने की इस पहल की सराहना की।

यह आयोजन न केवल नागपुरी भाषा की समृद्ध परंपरा का उत्सव था, बल्कि यह इस भाषा को वैश्विक साहित्यिक मंच पर स्थापित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम भी साबित हुआ।

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