मुकेश रंजन
Ranchi : रांची के बुढमू प्रखंड के चैनगढ़ा गाँव के बंदर मुता टोली में एक हृदयविदारक घटना घटी, जहाँ सड़क न होने के कारण उसके माता-पिता उसे पैदल ही अस्पताल ले जाने को मजबूर हुए। नवजात के माता-पिता, मनोज मुंडा और बबीता देवी, दुर्गम रास्ते पर पैदल यात्रा कर रहे थे, तभी बच्ची ने बीच रास्ते में ही दम तोड़ दिया, क्योंकि इलाज में देरी जानलेवा साबित हुई।
इस त्रासदी ने पूरे गाँव को गम और गुस्से में डुबो दिया है। 2011 में इस गाँव में बिजली पहुँची, लेकिन आज़ादी के 75 साल बाद भी, ग्रामीण अभी भी एक पक्की सड़क का इंतज़ार कर रहे हैं। स्थानीय सांसदों और विधायकों से बार-बार की गई अपील पर कोई सुनवाई नहीं हुई।
बबीता देवी अपने बेजान बच्चे को गोद में लिए हुए रो पड़ीं, जबकि उनके पति मनोज असहाय खड़े रहे। ग्रामीणों का कहना है कि शिशु की मौत प्रशासनिक लापरवाही और राजनीतिक उदासीनता का सीधा नतीजा है।
ग्राम प्रधान विनोद पाहन ने कहा, अगर सड़क होती, तो यह बच्ची बच सकती थी। लेकिन हमारी गुहार हमेशा अनसुनी कर दी जाती है।
इस घटना ने एक बार फिर प्रशासन को कड़ी निगरानी में ला दिया है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द ही सड़क नहीं बनाई गई, तो वे आंदोलन करने पर मजबूर होंगे। इस हृदयविदारक क्षति ने इस बहस को फिर से छेड़ दिया है कि भारत के कई ग्रामीण इलाकों में सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएँ आज भी एक दूर का सपना क्यों बनी हुई हैं।

