Ranchi : झारखंड की जैव विविधता और वन संपदा को बचाने के लिए जहां बड़ी-बड़ी योजनाएं बनती हैं, वहीं सिल्ली प्रखंड के कोरियाम टोला निवासी वनकर्मी घनेश्याम महतो ने अपने व्यक्तिगत समर्पण से एक अनूठा इतिहास रच दिया है।
वर्ष 2019 में रांची वन प्रमंडल के तहत कार्यभार संभालने वाले महतो ने अब तक 800 से अधिक पारंपरिक, औषधीय और जैविक पौधों की पहचान कर उनके संरक्षण का काम किया है।
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घनेश्याम महतो ने अपनी स्थानीय जनजातीय जानकारी और वन क्षेत्र के अनुभव को मिलाकर Anogeissus latifolia (धावन), Mitragyna parviflora (कदंब) और Wrightia tinctoria (मीढ़/इंद्रजौं) जैसे बहुमूल्य पौधों का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण शुरू किया है। इन पौधों का औषधीय, सांस्कृतिक और पारिस्थितिक दृष्टिकोण से विशेष महत्व है।
महतो ग्रामीणों, खासकर महिलाओं को वनस्पतियों की पहचान, उनके पारंपरिक प्रयोग और औषधीय महत्व से अवगत कराते हैं। उनका उद्देश्य है — स्थानीय ज्ञान को संरक्षित कर अगली पीढ़ियों तक पहुँचाना।
उनकी इस अनूठी पहल को न केवल झारखंड जैव विविधता बोर्ड ने मान्यता दी, बल्कि उन्हें वर्ष 2022 में नेपाल में आयोजित अंतरराष्ट्रीय वन सम्मेलन में भी आमंत्रित किया गया, जो किसी भी वनकर्मी के लिए एक बड़ी उपलब्धि है।
महतो की सूची में कुछ संकटग्रस्त और दुर्लभ वनस्पतियाँ हैं, जैसे:
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Drosera burmanii – कीटभक्षी पौधा
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Ceropegia hirsuta – दुर्लभ लता
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Ophioglossum costatum – फर्न की एक प्रजाति
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Vitex peduncularis – निरगुंडी
इन प्रजातियों पर वे डिजिटल डेटाबेस और वृत्तचित्र तैयार कर रहे हैं, जो आगे चलकर शोधकर्ताओं और वन नीति निर्माताओं के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे।
घनेश्याम महतो का सपना है कि झारखंड की पारंपरिक वन संपदा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान मिले। वे चाहते हैं कि यह ज्ञान केवल किताबों में सिमटकर न रह जाए, बल्कि जन-जन तक पहुँचे और प्रकृति के संरक्षण में उपयोग हो।
उनकी यह यात्रा साबित करती है कि समर्पण, ज्ञान और निष्ठा के साथ एक सामान्य व्यक्ति भी प्रकृति का सच्चा प्रहरी बन सकता है। घनेश्याम महतो आज हर्बल संरक्षण की एक प्रेरणादायक मिसाल बन चुके हैं।






