‘बुलडोजर जस्टिस’ पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में मतभेद, मामला तीसरे जज के पास

WhatsApp Group जुड़ने के लिए क्लिक करें 👉 Join Now Prayagraj : इलाहाबाद उच्च न्यायालय की दो-न्यायाधीशों की पीठ ने कथित ‘बुलडोजर जस्टिस’ के मुद्दे पर विभाजित (स्प्लिट) फैसला सुनाया है। एक न्यायाधीश ने एफआईआर दर्ज होने के बाद दो वर्ष तक आरोपी के मकान

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Prayagraj : इलाहाबाद उच्च न्यायालय की दो-न्यायाधीशों की पीठ ने कथित ‘बुलडोजर जस्टिस’ के मुद्दे पर विभाजित (स्प्लिट) फैसला सुनाया है। एक न्यायाधीश ने एफआईआर दर्ज होने के बाद दो वर्ष तक आरोपी के मकान को नहीं गिराने का निर्देश देने की राय दी, जबकि दूसरे न्यायाधीश ने इससे असहमति जताई। मतभेद के कारण मामले को अब तीसरे न्यायाधीश की राय के लिए मुख्य न्यायाधीश (चीफ जस्टिस) के पास भेज दिया गया है।

यह मामला हमीरपुर जिले के सुमेरपुर थाना क्षेत्र में दर्ज एक केस से जुड़ा है, जिसमें पॉक्सो अधिनियम और उत्तर प्रदेश गैर-कानूनी धर्मांतरण प्रतिषेध अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी।

वरिष्ठ न्यायाधीश ने क्या कहा?

वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस अतुल श्रीधरन ने अपने अलग फैसले में कहा कि किसी आपराधिक मामले के आरोपी के मकान को नगर निकाय कानूनों के उल्लंघन का हवाला देकर जल्दबाजी में ढहाना स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने ऐसी कार्रवाई को कार्यपालिका की संभावित प्रतिशोधात्मक कार्रवाई बताया।

उन्होंने सुझाव दिया कि एफआईआर दर्ज होने की तारीख से दो वर्ष तक आरोपी के मकान को गिराने की कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए, ताकि कानून के दुरुपयोग की आशंका से बचा जा सके।

दूसरे न्यायाधीश की असहमति

वहीं, जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने इस प्रस्ताव से असहमति जताई। उन्होंने कहा कि यह मानकर चला जाता है कि सरकार कानून के अनुरूप और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए कार्रवाई करेगी। यदि किसी व्यक्ति के साथ अन्याय होता है तो उसके लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा हमेशा खुला है।

उन्होंने यह भी कहा कि अदालत किसी कानून के क्रियान्वयन पर निश्चित अवधि के लिए सामान्य रोक नहीं लगा सकती, क्योंकि इससे संबंधित कानून का संचालन ही प्रभावित होगा।

तीसरे न्यायाधीश के समक्ष होंगे ये सवाल

दोनों न्यायाधीशों के अलग-अलग मत के बाद मामला मुख्य न्यायाधीश को भेजा गया है। अब तीसरे न्यायाधीश के समक्ष मुख्य रूप से दो प्रश्नों पर विचार होगा—

  • क्या संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय ऐसा व्यापक आदेश पारित कर सकता है, जिससे सरकार को दो वर्षों तक संबंधित कानूनों के तहत कार्रवाई करने से रोका जा सके?
  • क्या नगर निकाय कानूनों के तहत कार्रवाई शुरू करने से एक वर्ष पहले अधिकारियों को ‘इरादे का नोटिस’ (Notice of Intention) जारी करने का निर्देश दिया जा सकता है?

क्या है पूरा मामला?

मामले में फईमुद्दीन और उनके परिवार के दो अन्य सदस्यों ने याचिका दायर कर आरोप लगाया कि उनके एक रिश्तेदार के खिलाफ पॉक्सो और धर्मांतरण कानून के तहत मामला दर्ज होने के तुरंत बाद पुलिस की मिलीभगत से भीड़ ने उनके घर को निशाना बनाया। बाद में फईमुद्दीन को भी इस मामले में आरोपी बनाया गया।

याचिकाकर्ताओं ने आशंका जताई कि उनका मकान भी गिराया जा सकता है, जिसके बाद उन्होंने उच्च न्यायालय का रुख किया।

राज्य सरकार की ओर से अदालत में कहा गया कि याचिका समय से पहले दायर की गई है, क्योंकि अभी तक मकान गिराने की कोई कार्रवाई शुरू नहीं हुई है और याचिकाकर्ताओं को जारी नोटिस का जवाब भी लंबित है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का भी जिक्र

अपने फैसले में जस्टिस अतुल श्रीधरन ने कहा कि अदालत ने ऐसे कई मामले देखे हैं, जिनमें एफआईआर दर्ज होने के बाद मकान गिराने के नोटिस जारी किए गए और फिर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की गई। उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के बावजूद ऐसी घटनाएं सामने आती रही हैं।

वहीं, जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने कहा कि बढ़ती आबादी के कारण अवैध निर्माण की समस्या गंभीर है, लेकिन इसके नाम पर कानून के दायरे से बाहर जाकर कार्रवाई भी उचित नहीं हो सकती। उन्होंने ऐसे मामलों में जवाबदेही सुनिश्चित किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया।

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