DESK: स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और दूसरे डिजिटल उपकरण आज रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। इनसे काम आसान हुआ है और दुनिया से जुड़ना भी पहले की तुलना में बेहद सरल हो गया है। लेकिन स्क्रीन पर लगातार बढ़ता समय मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, लंबे समय तक डिजिटल कंटेंट में व्यस्त रहने की आदत कुछ लोगों में अकेलेपन, तनाव, अधीरता, चिड़चिड़ापन और तुरंत संतुष्टि पाने की प्रवृत्ति को बढ़ा सकती है। इसका असर केवल व्यक्ति की सोच पर नहीं, बल्कि परिवार और दोस्तों के साथ उसके व्यवहार पर भी पड़ सकता है।
डिजिटल लाइफस्टाइल क्यों बन रही चुनौती?
डिजिटल दुनिया में लगातार सक्रिय रहने के कारण लोगों की दिनचर्या तेजी से बदल रही है। मोबाइल पर संदेश, वीडियो, गेम, सोशल मीडिया और दूसरी गतिविधियां कई बार वास्तविक बातचीत और शारीरिक गतिविधियों के लिए मिलने वाले समय को कम कर देती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार डिजिटल उपयोग समस्या तब बन सकता है, जब व्यक्ति अपने रोजमर्रा के जरूरी काम, नींद, पढ़ाई, कामकाज या रिश्तों की कीमत पर लगातार स्क्रीन का इस्तेमाल करने लगे।
ये संकेत दिखें तो स्क्रीन टाइम पर दें ध्यान
- छोटी बातचीत या आमने-सामने संवाद में असहज महसूस करना
- नींद का समय बिगड़ना या बार-बार नींद टूटना
- लगातार तनाव, बोरियत या अकेलेपन का अनुभव
- परिवार और दोस्तों के साथ समय कम होना
- धैर्य में कमी और तुरंत प्रतिक्रिया देने की आदत
- सामान्य गतिविधियों में रुचि कम होना
- सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया को अपनी खुशी से जोड़ना
सोशल मीडिया हमारी सोच को कैसे प्रभावित करता है?
सोशल मीडिया पर लाइक, कमेंट और शेयर जैसी प्रतिक्रियाएं तुरंत मिलती हैं। यही वजह है कि कुछ लोगों में लगातार नई प्रतिक्रिया देखने की आदत विकसित हो सकती है। इससे वास्तविक जीवन की धीमी लेकिन गहरी संतुष्टि की तुलना में त्वरित मनोरंजन और प्रतिक्रिया अधिक आकर्षक लगने लगती है। सोशल मीडिया पर कन्फर्मेशन बायस का प्रभाव भी देखा जा सकता है। इसका अर्थ है कि व्यक्ति ऐसी जानकारी को ज्यादा पसंद करता है, जो उसके पहले से बने विचारों से मेल खाती हो। लगातार एक जैसे विचार या सामग्री देखने से अलग राय को स्वीकार करने में कठिनाई हो सकती है। हालांकि, सोशल मीडिया का असर हर व्यक्ति पर एक जैसा नहीं होता। इसका प्रभाव इस्तेमाल की अवधि, कंटेंट की प्रकृति और व्यक्ति की दिनचर्या पर निर्भर कर सकता है।
आमने-सामने बातचीत से बढ़ रही दूरी
ऑनलाइन बातचीत ने लोगों के बीच संपर्क आसान किया है, लेकिन लगातार वर्चुअल संवाद वास्तविक जीवन की बातचीत का विकल्प नहीं बन सकता। परिवार के सदस्यों के एक साथ बैठे होने के बावजूद अगर सभी अपने-अपने फोन में व्यस्त रहें, तो साथ बिताया गया समय भावनात्मक जुड़ाव में बदल नहीं पाता। लंबे समय तक ऐसा होने पर संवाद, सुनने की आदत और सामाजिक जुड़ाव प्रभावित हो सकते हैं। खासकर बच्चों और किशोरों के लिए परिवार के साथ नियमित बातचीत और ऑफलाइन गतिविधियां महत्वपूर्ण रहती हैं।
‘रील’ की दुनिया का असर ‘रियल’ लाइफ पर
सोशल मीडिया पर दिखाई जाने वाली सामग्री वास्तविक जीवन की पूरी तस्वीर नहीं होती। इसके बावजूद लगातार हिंसक, आक्रामक या नकारात्मक कंटेंट देखने से व्यक्ति के मन पर उसका प्रभाव पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल कंटेंट का चयन सोच-समझकर करना जरूरी है। नकारात्मक सामग्री से दूरी और सकारात्मक, उपयोगी तथा रचनात्मक कंटेंट को प्राथमिकता देना डिजिटल आदतों को बेहतर बना सकता है।
स्क्रीन टाइम का शरीर पर भी असर
डिजिटल उपकरणों का लंबे समय तक इस्तेमाल अक्सर बैठकर किया जाता है। इससे शारीरिक गतिविधियों का समय कम हो सकता है। लंबे समय तक स्क्रीन देखने, देर रात तक फोन इस्तेमाल करने और कम नींद की आदत से थकान और दिनचर्या प्रभावित हो सकती है। रात में स्क्रीन का इस्तेमाल कम करना और नियमित नींद का समय बनाए रखना बेहतर डिजिटल रूटीन का हिस्सा हो सकता है।
बच्चों के साथ बड़ों को भी बदलनी होगी आदत
डिजिटल निर्भरता को केवल बच्चों की समस्या मानना सही नहीं है। घर के बड़े भी अगर लगातार मोबाइल पर व्यस्त रहते हैं तो बच्चों के साथ बातचीत और पारिवारिक गतिविधियों के लिए समय कम हो सकता है। इसलिए बच्चों के स्क्रीन टाइम को सीमित करने के साथ माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों को भी अपनी डिजिटल आदतों पर ध्यान देना चाहिए। घर में कुछ समय ऐसा तय किया जा सकता है, जब सभी लोग मोबाइल और दूसरे स्क्रीन से दूर रहें।
क्या है ‘डिजिटल सनसेट’?
डिजिटल सनसेट का मतलब दिन के एक निश्चित समय के बाद मोबाइल, लैपटॉप, टीवी और दूसरे डिजिटल उपकरणों का इस्तेमाल कम या बंद करना है। खासकर सोने से पहले स्क्रीन से दूरी बनाने की आदत नींद की दिनचर्या को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है।
इसके लिए कुछ आसान बदलाव किए जा सकते हैं:
- सोने से पहले मोबाइल का इस्तेमाल कम करें।
- रोज कुछ समय परिवार के साथ बिना स्क्रीन के बिताएं।
- टहलना, साइकिल चलाना या खेल जैसी शारीरिक गतिविधि करें।
- रात में कॉफी और अन्य कैफीनयुक्त पेय से बचना बेहतर हो सकता है।
- रात का खाना समय पर करें।
- सोने से पहले किताब पढ़ें या डायरी लिखें।
- परिवार के सदस्यों के साथ आमने-सामने बातचीत करें।
डिजिटल डिटॉक्स से क्या मिल सकता है फायदा?
स्क्रीन टाइम को संतुलित करने से परिवार के साथ बातचीत और ऑफलाइन गतिविधियों के लिए अधिक समय मिल सकता है। बच्चों को अपनी बातें साझा करने का बेहतर अवसर मिल सकता है और दिनचर्या में शारीरिक गतिविधि बढ़ाई जा सकती है। सबसे जरूरी बात यह है कि तकनीक को पूरी तरह छोड़ना व्यावहारिक समाधान नहीं है। मोबाइल और सोशल मीडिया आज शिक्षा, काम और संचार के महत्वपूर्ण माध्यम हैं। जरूरत इस बात की है कि इनका इस्तेमाल संतुलित तरीके से किया जाए। अगर स्क्रीन के इस्तेमाल के कारण लगातार नींद, पढ़ाई, कामकाज, रिश्तों या रोजमर्रा की गतिविधियों में परेशानी हो रही हो, तो किसी योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना उचित रहेगा।

