Garhwa/Ranchi: झारखंड में हाथियों की मौत का सिलसिला एक बार फिर चिंता बढ़ा रहा है। गढ़वा जिले के रंका थाना क्षेत्र में जंगल से सटे पिपरादादर टोला के पास सोमवार सुबह एक जंगली हाथी मृत अवस्था में मिला। हाथी की मौत किन परिस्थितियों में हुई, फिलहाल इसका खुलासा नहीं हो सका है। वन विभाग ने मौके पर पहुंचकर जांच शुरू कर दी है और पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है। यह घटना ऐसे समय सामने आई है, जब कुछ दिन पहले पश्चिमी सिंहभूम में भी एक हथिनी मृत मिली थी। पोस्टमार्टम में उसके गर्भवती होने की पुष्टि हुई थी। लगातार सामने आ रही हाथियों की मौत की घटनाओं ने झारखंड में वन्यजीव संरक्षण और बढ़ते मानव-हाथी संघर्ष को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
जंगल किनारे मिला हाथी का शव, जांच में जुटा वन विभाग
वन विभाग के अनुसार, सोमवार सुबह करीब आठ बजे विश्रामपुर गांव के पिपरादादर टोला में जंगल के किनारे हाथी के मृत पड़े होने की सूचना मिली। जानकारी मिलते ही विभागीय टीम घटनास्थल पर पहुंची और इलाके का निरीक्षण शुरू किया। गढ़वा दक्षिणी वन प्रमंडल पदाधिकारी एबिन बेनी अब्राहम के मुताबिक, शुरुआती जांच के आधार पर हाथी की मौत के कारण को लेकर अभी कोई निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। पोस्टमार्टम के बाद ही वास्तविक वजह सामने आने की उम्मीद है। मौके पर वन विभाग के अधिकारी ललन कुमार समेत अन्य कर्मचारी मौजूद रहे। टीम आसपास के इलाके की भी जांच कर रही है और स्थानीय लोगों से जानकारी जुटाई जा रही है।
रंका क्षेत्र में पहले भी हो चुकी है हाथियों की मौत
विश्रामपुर पंचायत क्षेत्र में हाथी की मौत का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी इलाके में ऐसी घटनाएं सामने आती रही हैं। वर्ष 2019 में विश्रामपुर के नया टोला क्षेत्र में एक जंगली हाथी की मौत बिजली के करंट की चपेट में आने से हुई थी। इसके बाद अगस्त 2023 में भौंरी गांव के जंगल किनारे एक हाथी के शावक की भी मौत हुई थी। लगातार हो रही घटनाएं यह संकेत देती हैं कि जंगल और मानव बस्तियों के बीच बढ़ती नजदीकी वन्यजीवों के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है।
फसल से लेकर जान तक का खतरा, दोनों तरफ बढ़ रही परेशानी
रंका और आसपास के जंगल क्षेत्रों में हाथियों की आवाजाही लंबे समय से बनी हुई है। हाथियों के झुंड जंगल से निकलकर खेतों और गांवों तक पहुंच जाते हैं। इस दौरान धान, मक्का और दूसरी फसलों को नुकसान पहुंचने की शिकायतें सामने आती रही हैं। फसल बर्बाद होने से ग्रामीणों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। वहीं हाथियों को भगाने या उनसे अपनी फसल और घर बचाने के दौरान ग्रामीणों की जान पर भी खतरा बना रहता है। यानी मानव-हाथी संघर्ष में नुकसान सिर्फ ग्रामीणों का नहीं, बल्कि हाथियों को भी अपनी जान गंवानी पड़ रही है।
पुराने हाथी कॉरिडोर पर बढ़ता मानवीय दबाव बड़ी वजह
ग्रामीणों का कहना है कि इस इलाके में पहले हाथियों के आने-जाने के पारंपरिक रास्ते रहे हैं। समय के साथ इन रास्तों और जंगल के आसपास आबादी बढ़ी तथा कृषि भूमि का विस्तार हुआ। इससे हाथियों के पुराने मार्ग में इंसानी गतिविधियां बढ़ गईं। जब हाथी अपने पारंपरिक रास्ते से गुजरते हैं और सामने खेत, घर या अन्य निर्माण आ जाते हैं, तो टकराव की स्थिति पैदा हो जाती है। विशेषज्ञ स्तर पर ऐसे मामलों में हाथी कॉरिडोर की पहचान और संरक्षण को महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इससे हाथियों की आवाजाही के रास्ते सुरक्षित रह सकते हैं और ग्रामीण इलाकों में उनके प्रवेश की संभावना कम की जा सकती है।
ग्रामीणों ने की स्थायी समाधान की मांग
ग्रामीणों का कहना है कि हाथियों के गांव में आने के बाद उन्हें खदेड़ना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। इसके लिए वन विभाग को पहले से तैयारी करनी होगी।
ग्रामीणों की प्रमुख मांगें हैं:
- हाथियों के पारंपरिक कॉरिडोर की पहचान और सुरक्षा।
- जंगल के आसपास नियमित निगरानी।
- खतरनाक बिजली तारों की जांच।
- हाथियों की गतिविधियों की समय पर सूचना ग्रामीणों तक पहुंचाना।
- फसल और संपत्ति के नुकसान का उचित मुआवजा।
- मानव-हाथी संघर्ष कम करने के लिए दीर्घकालिक योजना।
हाथी के शव के बाद ग्रामीणों में चिंता
पिपरादादर जंगल में हाथी का शव मिलने के बाद आसपास के ग्रामीणों में भी चिंता बढ़ गई है। लोगों को आशंका है कि हाथियों का झुंड आसपास मौजूद हो सकता है। ऐसे में वन विभाग के सामने एक साथ दो बड़ी चुनौतियां हैं—मृत हाथी की मौत की वजह का पता लगाना और आसपास रहने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना। फिलहाल पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार है। रिपोर्ट आने के बाद ही पता चलेगा कि इस जंगली हाथी की मौत वास्तव में कैसे हुई और क्या इसके पीछे कोई मानवीय कारण भी था।




