बिहार के गांवों में बैंकिंग का नया सहारा बनीं जीविका दीदियां, 23 हजार करोड़ से ज्यादा का लेन-देन

बिहार के ग्रामीण इलाकों में बैंकिंग सेवाओं की तस्वीर तेजी से बदल रही है। अब गांव के लोगों को हर छोटे-बड़े बैंकिंग काम के लिए बैंक शाखा तक जाने की जरूरत नहीं पड़ रही है। जीविका की बैंक सखियां गांवों में ही माइक्रो-एटीएम और डिजिटल
गांवों में बैंकिंग का नया सहारा बनीं जीविका दीदियां
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पटना: बिहार के ग्रामीण इलाकों में बैंकिंग सेवाओं की तस्वीर तेजी से बदल रही है। अब गांव के लोगों को हर छोटे-बड़े बैंकिंग काम के लिए बैंक शाखा तक जाने की जरूरत नहीं पड़ रही है। जीविका की बैंक सखियां गांवों में ही माइक्रो-एटीएम और डिजिटल उपकरणों के जरिए लोगों को बैंकिंग सुविधाएं उपलब्ध करा रही हैं।

बैंक सखी के रूप में काम कर रहीं ये महिलाएं बैंक और ग्रामीणों के बीच संपर्क का काम कर रही हैं। स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को बैंकिंग से संबंधित प्रशिक्षण देकर बिजनेस कॉरेस्पोंडेंट एजेंट के रूप में तैयार किया गया है।

38 जिलों की 4,688 पंचायतों तक पहुंच

बिहार में इस समय 6,771 बैंक सखियां काम कर रही हैं। इनमें 6,735 बैंक सखियां IIBF से प्रमाणित हैं। बैंक सखी नेटवर्क राज्य के सभी 38 जिलों और 531 प्रखंडों तक पहुंच चुका है। इसके अलावा 4,688 पंचायतों में भी बैंक सखी सेवाएं उपलब्ध हैं। बैंक सखियों के माध्यम से अब तक 14.33 लाख से अधिक बैंक खाते खोले जा चुके हैं। इनके जरिए अब तक 23,200 करोड़ रुपये से अधिक का वित्तीय लेन-देन हुआ है।

बैंक सखी केंद्रों पर 67% महिलाएं

बैंक सखी व्यवस्था का सबसे ज्यादा फायदा ग्रामीण महिलाओं को मिल रहा है। बैंक सखी केंद्रों पर पहुंचने वाले ग्राहकों में करीब 67 प्रतिशत महिलाएं हैं। गांव में ही परिचित महिला से बैंकिंग सुविधा मिलने के कारण महिलाओं में बैंकिंग सेवाओं को लेकर भरोसा बढ़ा है। वे बचत, पैसे निकालने और दूसरी वित्तीय सेवाओं का इस्तेमाल पहले की तुलना में ज्यादा आसानी से कर रही हैं। बैंक सखियां बुजुर्गों, दिव्यांग लोगों और पेंशनधारियों को भी बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध कराने में मदद कर रही हैं।

महिलाओं के लिए रोजगार का भी जरिया

बैंक सखी मॉडल ने ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत करने का काम भी किया है। बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध कराने के बदले बैंक सखियों को कमीशन मिलता है। अब तक बैंक सखियां करीब 57.95 करोड़ रुपये का कमीशन कमा चुकी हैं। सर्वेक्षण में सामने आया है कि बैंक सखी बनने के बाद 48.81 प्रतिशत महिलाओं ने बीमा, 41.67 प्रतिशत ने ऋण और 31.75 प्रतिशत महिलाओं ने पेंशन योजनाओं का इस्तेमाल किया।

वित्तीय जागरूकता बढ़ाने में मदद

बैंक सखियां ग्रामीण लोगों को सिर्फ पैसे के लेन-देन की सुविधा नहीं दे रही हैं, बल्कि उन्हें बीमा, पेंशन, ऋण और बचत जैसी वित्तीय योजनाओं की जानकारी भी दे रही हैं। इससे ग्रामीण परिवारों में बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं को लेकर जागरूकता बढ़ रही है।

महिला आत्मनिर्भरता की दिशा में अहम कदम

ग्रामीण विकास विभाग एवं सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के मंत्री श्रवण कुमार ने कहा कि बैंक सखी मॉडल ग्रामीण महिलाओं को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने कहा कि 6,700 से ज्यादा बैंक सखियों ने साबित किया है कि प्रशिक्षण और सही अवसर मिलने पर ग्रामीण महिलाएं न सिर्फ अपने परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत कर सकती हैं, बल्कि गांव की वित्तीय व्यवस्था में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। बैंक सखियों के जरिए गांव की चौखट तक बैंकिंग सेवाएं पहुंचने से ग्रामीण क्षेत्रों में वित्तीय समावेशन को बढ़ावा मिल रहा है। यह मॉडल महिलाओं के लिए रोजगार और आत्मनिर्भरता का भी नया रास्ता खोल रहा है।

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