अमित शाह के बयान पर सियासत तेज, जनजाति महाकुंभ को लेकर मेघा उरांव का विपक्ष पर हमला

WhatsApp Group जुड़ने के लिए क्लिक करें 👉 Join Now “वनवासी शब्द हमारी पहचान, इसे विवाद बनाना दुर्भाग्यपूर्ण” मुकेश रंजन Ranchi : 24 मई 2026 को ऐतिहासिक लाल किला मैदान में आयोजित जनजाति सांस्कृतिक समागम एवं जनजाति महाकुंभ को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई

अमित शाह के बयान पर सियासत तेज, जनजाति महाकुंभ को लेकर मेघा उरांव का विपक्ष पर हमला
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  • “वनवासी शब्द हमारी पहचान, इसे विवाद बनाना दुर्भाग्यपूर्ण”

मुकेश रंजन 

Ranchi : 24 मई 2026 को ऐतिहासिक लाल किला मैदान में आयोजित जनजाति सांस्कृतिक समागम एवं जनजाति महाकुंभ को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के संबोधन के बाद “वनवासी” शब्द को लेकर विपक्षी दलों द्वारा किए जा रहे विरोध पर सामाजिक कार्यकर्ता मेघा उरांव ने तीखी प्रतिक्रिया दी है।

उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी, तथाकथित बाप पार्टी और चर्च समर्थित समूह जनजातीय महाकुंभ में उमड़ी भारी भीड़ से घबराए हुए हैं। यही कारण है कि वे “जनजाति”, “वनवासी” और “हिंदू सनातन” जैसे शब्दों पर अनावश्यक विवाद खड़ा कर रहे हैं।

मेघा उरांव ने कहा कि यदि अमित शाह ने अपने संबोधन में “वनवासी” शब्द का प्रयोग किया है तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है। हमारे पूर्वज सदियों से जंगलों और वनों में निवास करते आए हैं। आज भले ही लोग पढ़-लिखकर शहरों में बस गए हों, लेकिन हमारी मूल पहचान जल, जंगल और जमीन से ही जुड़ी हुई है।

उन्होंने कहा कि एक ओर कुछ लोग आदिवासियों की पहचान जल, जंगल और जमीन बताते हैं, वहीं दूसरी ओर “वनवासी” शब्द पर विरोध जताते हैं, जो दोहरी मानसिकता को दर्शाता है।

वन अधिकार अधिनियम का दिया हवाला:

मेघा उरांव ने कहा कि वन अधिकार अधिनियम 2006 में भी वन निवासी जनजातीय समुदायों और पारंपरिक वनवासियों के अधिकारों को मान्यता दी गई है। अधिनियम में स्पष्ट उल्लेख है कि जो समुदाय पीढ़ियों से जंगलों में निवास कर रहे हैं तथा अपनी आजीविका और सामाजिक-सांस्कृतिक आवश्यकताओं के लिए वन संसाधनों पर निर्भर हैं, उन्हें अधिकार प्राप्त हैं।

उन्होंने कहा कि “अन्य पारंपरिक वन निवासी” की परिभाषा में भी उन समुदायों को शामिल किया गया है जो 13 दिसंबर 2005 से पूर्व कम-से-कम तीन पीढ़ियों से वन क्षेत्रों में रह रहे हैं।

जयपाल सिंह मुंडा के बयान का उल्लेख:

मेघा उरांव ने संविधान सभा में स्वर्गीय जयपाल सिंह मुंडा के ऐतिहासिक भाषण का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि 16 दिसंबर 1946 को संविधान सभा में जयपाल सिंह मुंडा ने कहा था कि वे भारत के मूल निवासियों और पिछड़ी जनजातियों की ओर से बोल रहे हैं।

उन्होंने उनके उस चर्चित कथन का भी उल्लेख किया जिसमें उन्होंने कहा था कि “मुझे जंगली होने पर गर्व है।”

धर्मांतरण और डीलिस्टिंग पर भी उठाए सवाल:

मेघा उरांव ने कहा कि डीलिस्टिंग के मुद्दे पर ईसाइयों से अधिक उनके समर्थक और दलाल विरोध कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि गांवों में तेजी से धर्मांतरण हो रहा है, लेकिन इस विषय पर तथाकथित सामाजिक संगठन और विपक्षी दल चुप्पी साधे हुए हैं।

उन्होंने कहा कि जनजाति महाकुंभ में धर्मांतरण और लव जिहाद जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया गया, लेकिन विरोध करने वाले लोग इन विषयों पर अपना पक्ष स्पष्ट नहीं कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि समाज को बांटने की राजनीति के बजाय जनजातीय समाज की संस्कृति, परंपरा और अधिकारों की रक्षा पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

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