Ranchi(Jharkhand): झारखंड की राजनीति और आदिवासी समाज के बीच गहराते सरना धर्म कोड के मुद्दे पर अब तीखी बहस छिड़ गई है। प्रख्यात आदिवासी चिंतक और सामाजिक विश्लेषक प्रदीप टोप्पो ने इस मसले पर बड़ा बयान देते हुए कहा है कि सरना धर्म कोड की मांग न केवल भ्रमित करने वाली है, बल्कि इससे आदिवासी समाज को नुकसान ही हो रहा है।
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प्रदीप टोप्पो के अनुसार, कई आदिवासी नेता और अगुवा संविधान की पूरी जानकारी के बिना समाज को भटकाने का काम कर रहे हैं। उन्होंने इसे एक राजनीतिक भ्रमजाल और भावनात्मक आंदोलन बताया, जिसका दीर्घकालिक प्रभाव आदिवासी युवाओं और उनकी पहचान पर गंभीर हो सकता है।
प्रदीप टोप्पो के बयान के मुख्य बिंदु:
- संविधान में अनुसूचित जनजातियों को पहले से मान्यता प्राप्त है, अलग कोड की आवश्यकता नहीं।
- सरना कोड के नाम पर असली मुद्दों से ध्यान भटकाया जा रहा है।
- आदिवासी अगुवा संविधान को समझे बिना लोगों को गुमराह कर रहे हैं।
- आंदोलन भावनात्मक है, परंतु इसके परिणाम खतरनाक हो सकते हैं।
संविधान और पहचान के बीच सवाल:
प्रदीप टोप्पो का यह बयान उस समय आया है जब झारखंड और अन्य राज्यों में सरना धर्म कोड की मांग फिर से जोर पकड़ रही है। टोप्पो का मानना है कि आदिवासियों की पहचान संविधान में पहले से संरक्षित है, और इसे बदलने की बजाय अधिकारों की सही समझ विकसित की जानी चाहिए।
समाज में मिली-जुली प्रतिक्रिया:
उनके इस बयान के बाद समर्थक और विरोधी दोनों पक्षों में बहस छिड़ गई है। कुछ लोगों ने उनके विचार को साहसिक और तार्किक बताया, तो वहीं कुछ लोगों ने इसे सरना आस्था पर हमला माना। यह विवाद अब केवल कोड तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आदिवासी अधिकारों की समझ और उसके भविष्य की ओर इशारा कर रहा है।
अब सवाल यह है – क्या हमें सरना कोड की आवश्यकता है, या हमें संविधान की सही व्याख्या और जानकारी के साथ अपने अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए?



