Ranchi : झारखंड की सियासत में उस समय हलचल मच गई जब वरिष्ठ जनजातीय नेता सोमा उरांव ने एक पूर्व मंत्री द्वारा जनजातीय समुदाय की धार्मिक पहचान पर दिए गए विवादास्पद बयान पर जोरदार प्रतिक्रिया दी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “विधायक बन जाने से संविधान का ज्ञान नहीं आ जाता, जाकर पढ़िए संविधान!”
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सोमा उरांव ने कहा कि संविधान में साफ तौर पर उल्लेख है कि जनजातीय समुदाय हिंदू है और यह पहचान किसी की सोच या बयान से नहीं बदल सकती। उन्होंने जोर देकर कहा कि जनजातीय समाज की आस्था, अधिकार और पहचान को संविधान मान्यता देता है और इसे नकारने की कोशिश जनजातीय अस्मिता पर सीधा हमला है।
इस बयान के बाद राज्य की राजनीति में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सोमा उरांव की यह टिप्पणी न केवल एक विधायक पर करारा प्रहार है, बल्कि जनजातीय समाज के धार्मिक और सांस्कृतिक स्वाभिमान की भी मजबूत अभिव्यक्ति है।
सोमा उरांव ने कहा, “अब जनजातीय समाज को बरगलाने की कोई भी कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अगर किसी को हमारी पहचान पर शक है, तो सबसे पहले संविधान का अध्ययन करें।”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि संविधान सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि जनजातीय समाज की संरचना और सम्मान का आधार है।
राजनीतिक हलकों में कुछ लोगों का मानना है कि यह बयान आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए दिया गया है, जिससे जनभावनाओं को जागृत किया जा सके। हालांकि, सोमा उरांव की बातों की गंभीरता और स्पष्टता को नकारा नहीं जा सकता।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह विवाद सिर्फ एक तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि जनजातीय अधिकारों और धार्मिक पहचान को लेकर एक गहरी सियासी बहस की शुरुआत हो सकती है।
सोमा उरांव का यह बयान राज्य की राजनीति को एक नए मोड़ पर ले जा सकता है, जहां धर्म, संविधान और जनजातीय अधिकारों की व्याख्या केंद्र में रहेगी।






