New Delhi : सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को एक बेहद संवेदनशील और भावुक मामला सामने आया, जहां एक पिता ने अपने 31 वर्षीय बेटे को जीवन रक्षक प्रणाली से हटाकर प्राकृतिक रूप से मरने देने की अनुमति मांगी। बेटे की हालत देखकर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने गहरी संवेदना जताई और कहा कि “हम इस युवक को इस हालत में नहीं छोड़ सकते।”
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ इस याचिका पर सुनवाई कर रही है। एम्स की सेकेंडरी मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट पर विचार करते हुए पीठ ने इसे “बेहद दुखद” करार दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी अंतिम आदेश से पहले वह स्वयं युवक के माता-पिता से मुलाकात करेगी। इसके लिए 13 जनवरी को दोपहर 3 बजे की तारीख तय की गई है।
दरअसल, वर्ष 2013 में चौथी मंजिल से गिरने के बाद हरीश राणा नामक युवक पिछले करीब 12 वर्षों से वेजिटेटिव स्टेट में है। इस अवस्था में व्यक्ति की आंखें खुली रहती हैं, लेकिन उसमें किसी तरह की चेतना या प्रतिक्रिया नहीं होती। वह कोमा से अलग स्थिति मानी जाती है। युवक 100 प्रतिशत दिव्यांगता यानी क्वाड्रिप्लेजिया से पीड़ित है।
युवक के पिता अशोक राणा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर बेटे के इलाज को रोकने और पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति देने की मांग की है। इससे पहले 26 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा के जिला अस्पताल को मेडिकल बोर्ड गठित कर रिपोर्ट देने का निर्देश दिया था। बोर्ड ने रिपोर्ट में बताया कि युवक के ठीक होने की संभावना बेहद कम है।
इसके बाद 11 दिसंबर को शीर्ष अदालत ने कहा था कि युवक ट्रेकियोस्टोमी ट्यूब से सांस ले रहा है और गैस्ट्रोस्टोमी के जरिए भोजन दिया जा रहा है। शरीर पर गंभीर बेड सोर हैं और डॉक्टरों की राय में उसकी हालत में सुधार की कोई ठोस उम्मीद नहीं है। इसी के बाद एम्स को मेडिकल बोर्ड बनाकर विस्तृत रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया था।
एम्स की रिपोर्ट सामने आने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर इसे अत्यंत दुखद मामला बताया और कहा कि इस पर मानवीय दृष्टिकोण से विचार किया जाना जरूरी है। अदालत ने पहले भी इस मामले में केंद्र सरकार की रिपोर्ट के आधार पर इलाज रोकने की अनुमति देने से इनकार किया था, जिसमें कहा गया था कि मरीज को उत्तर प्रदेश सरकार की मदद से घर पर देखभाल दी जाएगी।



