मुकेश रंजन
Ranchi : राजधानी रांची से मात्र 38 किलोमीटर दूर बुढ़मू प्रखंड के चैनगढ़ा पंचायत का बंदरमुता टोला आज़ादी के 75 वर्षों बाद भी बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहा है। टूटी-फूटी पगडंडियां, बरसात में नाले में बदल जाने वाले रास्ते और जगह-जगह दलदल ने ग्रामीणों की ज़िंदगी को नरकीय बना दिया है।

मानसून में कच्चा रास्ता पानी के तेज बहाव से नदी का रूप ले लेता है। पक्की सड़क, पुलिया और जलनिकासी की कोई व्यवस्था नहीं, गर्भवती महिलाएं, बीमार मरीज और स्कूली बच्चे रोज़ जोखिम भरी यात्रा करने को मजबूर हैं। ग्रामीणों का दर्द देश अमृतकाल में है, लेकिन हमारा गांव आज भी बदहाली के अंधेरे में जी रहा है।
बरसात में घर से निकलना, खेत-खलिहान जाना या प्रसव पीड़िता को अस्पताल पहुंचाना किसी जंग से कम नहीं। स्कूली बच्चे घंटों बारिश थमने का इंतज़ार करते हैं, लेकिन कई बार उन्हें लौटना पड़ता है।
ग्रामीणों का आक्रोश :
गांव के बुजुर्गों का कहना है कि यह सिर्फ पुलिया की मांग नहीं, यह हमारी सुरक्षा का सवाल है। 75 वर्षों में सड़क न बन पाना, सरकार के विकास दावों पर करारा तमाचा है।
2011 में मिली बिजली, वरना…
पूर्व जिला परिषद उपाध्यक्षा पार्वती देवी के प्रयास से 2011 में गांव में बिजली पहुँची, वरना आज भी लोग ढिबरी के सहारे जी रहे होते। पार्वती देवी ने कहा जनता को बुनियादी सुविधाएं देना सरकार की जिम्मेदारी है, और हम इसके लिए लगातार आवाज उठाते रहेंगे।
राजनीतिक उपेक्षा का आरोप:
ग्रामीणों का आरोप है कि पिछले 25 वर्षों से भाजपा विधायक जीतते रहे, लेकिन विकास सिर्फ चुनावी भाषणों और पोस्टरों तक सीमित रहा। अब गांव वालों ने ऐलान किया है सड़क नहीं, तो वोट नहीं । आगामी पंचायत, लोकसभा और विधानसभा चुनाव में जोरदार विरोध होगा।
ग्रामीणों की मांग है कि तुरंत पुलिया और पक्की सड़क का निर्माण किया जाए, ताकि बंदरमुता टोला भी विकास की मुख्यधारा में शामिल हो सके।



