दिल्ली के झारखंड भवन ठहराव नियमों पर सदन में हंगामा, ऊर्जा गेस्ट हाउस भी घेरे में

Ranchi : झारखंड विधानसभा के शीतकालीन सत्र के चौथे दिन बुधवार को विपक्ष ने दिल्ली स्थित झारखंड भवन और ऊर्जा विभाग के गेस्ट हाउस में ठहरने से जुड़े नियमों और व्यवस्थाओं को लेकर सरकार को कठघरे में खड़ा किया। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने इन

दिल्ली के झारखंड भवन ठहराव नियमों पर सदन में हंगामा, ऊर्जा गेस्ट हाउस भी घेरे में
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Ranchi : झारखंड विधानसभा के शीतकालीन सत्र के चौथे दिन बुधवार को विपक्ष ने दिल्ली स्थित झारखंड भवन और ऊर्जा विभाग के गेस्ट हाउस में ठहरने से जुड़े नियमों और व्यवस्थाओं को लेकर सरकार को कठघरे में खड़ा किया। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने इन दोनों संस्थानों के संचालन, नियमन और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाते हुए सरकार से स्पष्ट जवाब की मांग की।

बाबूलाल मरांडी ने सदन में कहा कि कैबिनेट निगरानी विभाग द्वारा झारखंड भवन में केवल विधायकों के सगे संबंधियों को ठहरने की अनुमति देना न तो व्यावहारिक है और न ही तर्कसंगत। उन्होंने इस निर्णय को तत्काल वापस लेने की मांग की। मरांडी ने आरोप लगाया कि नियमों को दरकिनार कर कुछ लोगों को “संबंधी” दर्शाकर ठहराने की अनुशंसा की गई।

उन्होंने कहा कि डॉ. रामेश्वर उरांव द्वारा आलोक दूबे और लाल किशोर नाथ शाहदेव को झारखंड भवन में ठहराने के लिए उन्हें रिश्तेदार बताकर अनुशंसा करना नियमों के दुरुपयोग का उदाहरण है। मरांडी ने विधानसभा अध्यक्ष से पिछले पांच वर्षों का झारखंड भवन का रजिस्टर मंगाने की मांग की, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि वहां वास्तव में किन लोगों को ठहराया गया है।

इसके साथ ही नेता प्रतिपक्ष ने दिल्ली स्थित ऊर्जा विभाग के गेस्ट हाउस का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने बताया कि इस गेस्ट हाउस के लिए राज्य सरकार हर माह करीब पांच लाख रुपये किराया देती है। इसके बावजूद उन्होंने सवाल किया कि क्या अब तक किसी विधायक ने वास्तव में वहां ठहराव किया है या नहीं।

मरांडी ने मांग की कि ऊर्जा विभाग के गेस्ट हाउस का पूरा विवरण सदन में रखा जाए, जिसमें ठहरने वालों की सूची, रजिस्टर, वहां कार्यरत स्टाफ, उपलब्ध वाहन, संचालन व्यवस्था, प्रभारी अधिकारी और आवंटन प्रक्रिया की जानकारी शामिल हो।

नेता प्रतिपक्ष के आरोपों और सवालों पर संसदीय कार्य मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कहा कि मामला गंभीर है। उन्होंने सदन को आश्वस्त किया कि कैबिनेट की स्वीकृति के बिना ऐसे किसी भी फैसले का कोई औचित्य नहीं है। सरकार इन सभी बिंदुओं की जांच कराएगी और उचित कार्रवाई की जाएगी।

इस मुद्दे ने सदन में व्यवस्था, पारदर्शिता और सरकारी संसाधनों के उपयोग को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

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