Ranchi : झारखंड हाई कोर्ट ने तलाक से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में साफ कहा है कि केवल संदेह, सामान्य आरोप या आशंकाओं के आधार पर विवाह विच्छेद नहीं किया जा सकता। अदालत ने पति की ओर से दायर तलाक याचिका को खारिज करते हुए परिवार न्यायालय के फैसले को सही ठहराया है।
हाई कोर्ट की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि व्यभिचार, क्रूरता या परित्याग जैसे गंभीर आरोपों को साबित करने के लिए ठोस, विश्वसनीय और कानूनी साक्ष्य जरूरी होते हैं। मात्र आरोप लगाना या शक जताना पर्याप्त नहीं है।
कोर्ट ने क्या कहा
अदालत ने स्पष्ट किया कि पति द्वारा लगाए गए अवैध संबंध, मानसिक क्रूरता और परित्याग के आरोपों के समर्थन में कोई प्रत्यक्ष प्रमाण, दस्तावेज या कॉल डिटेल रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किए गए। ऐसे में इन आरोपों को साबित नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि वैवाहिक जीवन में होने वाले सामान्य मतभेद, कहासुनी या पारिवारिक तनाव को क्रूरता नहीं कहा जा सकता। इसी तरह, पत्नी का घर छोड़ना तब तक परित्याग नहीं माना जा सकता, जब तक उसके सभी कानूनी तत्व पूरे न हों।
खंडपीठ ने माना कि परिवार न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों का सही तरीके से मूल्यांकन किया है और उसके फैसले में किसी तरह की कानूनी त्रुटि नहीं पाई गई।
क्या था पूरा मामला
मामले में दंपति का विवाह वर्ष 2011 में हुआ था और उनके दो बच्चे हैं। पति ने अदालत में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी का किसी अन्य व्यक्ति से अवैध संबंध है और वह बच्चों तथा घरेलू सामान के साथ घर छोड़कर चली गई। इन्हीं आधारों पर उसने तलाक की मांग की थी।
हालांकि, अदालत ने पाया कि पति अपने आरोपों को साबित करने में असफल रहा। इसी कारण तलाक की मांग को खारिज कर दिया गया।
फैसला क्यों है अहम
यह फैसला उन मामलों में मिसाल माना जा रहा है, जहां केवल संदेह या बिना ठोस प्रमाण के तलाक की मांग की जाती है। हाई कोर्ट के इस निर्णय से यह साफ संदेश गया है कि विवाह विच्छेद जैसे गंभीर निर्णय के लिए पुख्ता साक्ष्य अनिवार्य हैं, न कि केवल आरोप या शक।

