Ranchi : राजधानी रांची से महज 38 किलोमीटर दूर बुढ़मू प्रखंड के चैनगढ़ा पंचायत अंतर्गत बंदरमुता टोला आजादी के 75 वर्षों बाद भी विकास की बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। गांव की तस्वीर कुछ ऐसी है कि बरसात में पगडंडियां नालों में तब्दील हो जाती हैं, रास्ते दलदल बन जाते हैं और एक छोटी सी दूरी तय करना भी ग्रामीणों के लिए पहाड़ जैसा हो जाता है।

पक्की सड़क, पुलिया और जलनिकासी जैसी जरूरी सुविधाएं आज भी केवल कागजों पर हैं। बरसात में रास्ते बह जाने के कारण बच्चों को स्कूल जाना और बीमारों को अस्पताल पहुंचाना सबसे कठिन काम बन जाता है।
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इस जमीनी हकीकत को लेकर झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLCM) के कांके विधानसभा के पूर्व प्रत्याशी फुलेश्वर बैठा ने गांव का दौरा किया। उन्होंने इसे केवल सड़क या पुलिया की मांग नहीं, बल्कि ग्रामवासियों की सुरक्षा और गरिमा का सवाल बताया। उन्होंने प्रशासन से आग्रह किया कि कम से कम 5 कलवर्ट पाइप या एक स्थायी पुलिया का निर्माण करवाया जाए, जिससे लोगों को राहत मिल सके।
फुलेश्वर बैठा ने यह भी कहा कि यदि प्रशासन ने जल्द कार्रवाई नहीं की, तो जेएलकेएम आंदोलन का रास्ता अपनाएगा।
ग्रामीणों ने बताया कि 2011 में पूर्व जिला परिषद उपाध्यक्ष पार्वती देवी

के प्रयासों से गांव में बिजली पहुंची थी, वरना लोग आज भी ढिबरी के सहारे रहते। पार्वती देवी ने भी साफ कहा कि बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना सरकार का कर्तव्य है और इसके लिए वो लगातार आवाज उठाती रहेंगी।
गांववालों ने आक्रोशित होकर कहा की कांके विधानसभा में 25 वर्षों से भाजपा विधायक जीतते रहे, लेकिन विकास केवल चुनावी वादों तक सिमटा रहा। ग्रामीणों ने सवाल उठाया कि क्या अब वर्तमान विधायक उनकी पीड़ा सुनेंगे या फिर बंदरमुता टोला विकास से यूं ही वंचित रहेगा।
जहां देश अमृतकाल में प्रवेश कर रहा है, वहीं बंदरमुता टोला आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संवेदनहीन व्यवस्था का प्रतीक बना हुआ है।






