- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने लंदन में आयोजित ‘एकता का जश्न’ कार्यक्रम में हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्र, सेवा, समाज और मानवता के भविष्य को लेकर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि RSS के काम का आधार नफरत नहीं, बल्कि शुद्ध सात्त्विक प्रेम है। समाज के लोगों को जोड़ना और सभी के प्रति अपनापन रखना संघ की सोच का हिस्सा है।
International News: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने लंदन में आयोजित ‘एकता का जश्न’ कार्यक्रम में हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्र, सेवा, समाज और मानवता के भविष्य को लेकर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि RSS के काम का आधार नफरत नहीं, बल्कि शुद्ध सात्त्विक प्रेम है। समाज के लोगों को जोड़ना और सभी के प्रति अपनापन रखना संघ की सोच का हिस्सा है।
समाज को जोड़ना RSS की सोच का हिस्सा
मोहन भागवत ने कहा कि संघ का उद्देश्य समाज में लोगों के बीच दूरी पैदा करना नहीं, बल्कि उन्हें एक-दूसरे से जोड़ना है। उन्होंने कहा कि समाज में सभी लोगों के प्रति अपनापन और एक-दूसरे के प्रति सम्मान की भावना जरूरी है।
उन्होंने हिंदू सोच की व्याख्या करते हुए कहा कि इसमें परिवार, समाज, मानवता और प्रकृति को अलग-अलग नहीं देखा जाता, बल्कि ये सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
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प्रकृति पर विजय नहीं, उसके साथ संतुलन जरूरी
मोहन भागवत ने प्रकृति और पर्यावरण को लेकर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि मनुष्य को प्रकृति पर विजय हासिल करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इंसान स्वयं प्रकृति का हिस्सा है।
उनके मुताबिक विकास का मतलब केवल इंसान की आर्थिक या व्यक्तिगत प्रगति नहीं होना चाहिए। विकास ऐसा होना चाहिए जिसमें व्यक्ति, समाज, मानवता और प्रकृति, सभी के हितों का ध्यान रखा जाए।
व्यक्ति और समाज के बीच संतुलन जरूरी
मोहन भागवत ने कहा कि केवल व्यक्ति के विकास पर ध्यान देने से काम नहीं चलेगा। अगर सिर्फ व्यक्ति को महत्व दिया गया तो समाज कमजोर हो सकता है। वहीं, अगर केवल समाज को महत्व दिया जाए तो व्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित होने का खतरा रहता है।
उन्होंने कहा कि इसलिए व्यक्ति और समाज के बीच संतुलन कायम करना जरूरी है, ताकि दोनों साथ-साथ आगे बढ़ सकें।
हिंदुत्व को केवल धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं किया जा सकता
हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र के मुद्दे पर बोलते हुए मोहन भागवत ने कहा कि हिंदू को केवल धार्मिक पहचान के आधार पर नहीं समझा जा सकता।
उन्होंने भारत की विविधता का जिक्र करते हुए कहा कि देश में नास्तिक से लेकर आस्तिक तक और अलग-अलग विचारधाराओं को मानने वाले लोग रहे हैं। हिंदू सोच के अनुसार अलग-अलग रास्तों और विचारों को स्वीकार करने की परंपरा रही है।
राष्ट्र और नेशन में अंतर है
मोहन भागवत ने राष्ट्र और ‘नेशन’ के बीच अंतर बताते हुए कहा कि आधुनिक अर्थ में नेशन अक्सर एक राज्य और उसकी शासन व्यवस्था से जुड़ा होता है। वहीं, राष्ट्र का आधार केवल शासन व्यवस्था नहीं होता।
उनके अनुसार राष्ट्र के पीछे एक उद्देश्य, साझा चेतना और समाज को जोड़ने वाली भावना होती है। उन्होंने भारत के इतिहास का उदाहरण देते हुए कहा कि यहां समय के साथ राजा और शासन व्यवस्थाएं बदलती रहीं और भारत विदेशी शासन के अधीन भी रहा, लेकिन देश की सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना बनी रही।
हिंदू राष्ट्र का उद्देश्य दुनिया को विविधता में एकता का संदेश देना
मोहन भागवत ने हिंदू राष्ट्र की अपनी व्याख्या करते हुए कहा कि इसका उद्देश्य दुनिया को यह बताना है कि विविधता स्वाभाविक है और एकता वास्तविकता है।
उन्होंने कहा कि भारत में अलग-अलग समय पर शासन व्यवस्थाएं बदलीं, लेकिन समाज की मूल चेतना और एकता की भावना बनी रही। उनके मुताबिक भारत की पहचान उसकी विविधता के बावजूद लोगों को जोड़ने वाली साझा चेतना से बनती है।
भारत की प्रगति का मतलब किसी दूसरे देश के खिलाफ जाना नहीं
भारत के विकास को लेकर मोहन भागवत ने कहा कि देश की प्रगति का अर्थ किसी दूसरे देश के खिलाफ खड़ा होना नहीं है। भारत अगर आगे बढ़ता है तो उसकी प्रगति का लाभ पूरी दुनिया को मिलना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भारत के विकास की दिशा ऐसी होनी चाहिए, जिससे मानवता और पूरी दुनिया को फायदा पहुंचे। उनके मुताबिक भारत की प्रगति का उद्देश्य केवल अपने लिए आगे बढ़ना नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के कल्याण में योगदान देना होना चाहिए।



