एफआईआर या चार्जशीट से कोई अपराधी नहीं: हाईकोर्ट

WhatsApp Group जुड़ने के लिए क्लिक करें 👉 Join Now Prayagraj : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि केवल एफआईआर या चार्जशीट दाखिल हो जाने भर से किसी व्यक्ति को अपराधी नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया

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Prayagraj : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि केवल एफआईआर या चार्जशीट दाखिल हो जाने भर से किसी व्यक्ति को अपराधी नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकारी नौकरी में चयन के बाद दर्ज हुए केस की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, न कि सिर्फ पुलिस रिपोर्ट के आधार पर नियुक्ति रोकी जाए।

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यह आदेश न्यायमूर्ति जे. जे. मुनीर की एकल पीठ ने विवेक यादव की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याची वर्ष 2015 की पीएसी कांस्टेबल भर्ती में चयनित हुआ था। लेकिन नियुक्ति से पहले उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज हो गई। बाद में चार्जशीट भी दाखिल की गई थी, हालांकि कोर्ट के निर्देश पर दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ और चार्जशीट निरस्त कर दी गई।

कोर्ट ने कहा कि वाराणसी के जिलाधिकारी ने बिना विवेक का प्रयोग किए, केवल पुलिस रिपोर्ट के आधार पर विवेक यादव को नियुक्ति के लिए अयोग्य ठहरा दिया। यह प्रशासनिक लापरवाही है। कोर्ट ने डीसीपी वाराणसी के 20 जुलाई 2024 के आदेश को रद्द करते हुए पुलिस कमिश्नर, डिप्टी पुलिस कमिश्नर और भर्ती बोर्ड को 8 सप्ताह में मामले की दोबारा समीक्षा कर निर्णय लेने का निर्देश दिया है।

कोर्ट ने कहा कि याची ने कोई तथ्य नहीं छिपाया था, और उसके खिलाफ दर्ज केस भी कोई अनैतिक या गंभीर अपराध से जुड़ा नहीं था। केवल एफआईआर दर्ज होना और चार्जशीट दाखिल हो जाना पर्याप्त कारण नहीं है कि किसी चयनित उम्मीदवार को नौकरी से वंचित कर दिया जाए। विशेषकर तब, जब समझौते के बाद मामला समाप्त हो चुका हो।

न्यायालय ने कहा कि सरकारी नौकरी पाने पर कई बार जलन और विद्वेषवश झूठे केस दर्ज करा दिए जाते हैं। ऐसे मामलों में डीएम को केवल कागज़ी कार्रवाई करने वाला नौकरशाह नहीं बनना चाहिए, बल्कि सहानुभूतिपूर्वक और विवेकपूर्ण ढंग से निर्णय लेना चाहिए।

यह फैसला उन हजारों युवाओं के लिए उम्मीद की किरण है, जो झूठे मामलों में फंसने के कारण सरकारी नौकरी से वंचित हो जाते हैं।

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