Ranchi : झारखंड की आदिवासी राजनीति एक बार फिर नए मोड़ पर है। फुलचंद तिर्की के हालिया बयान के बाद आदिवासी समाज में गहरी बहस शुरू हो गई है। इस बहस को और धार दी है आदिवासी नेता सोमा उरांव ने, जिन्होंने तिर्की के बयानों को ‘संविधान विरोधी’ और ‘जनजातीय अस्मिता पर हमला’ बताया।
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सोमा उरांव ने तीखे शब्दों में कहा कि “फुलचंद तिर्की पहले संविधान समझें, फिर समाज को समझाने की कोशिश करें। जो लोग खुद संविधान की मूल भावना को नहीं समझते, वे आदिवासी समाज को दिशा देने की बात कर रहे हैं, यह हास्यास्पद है।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू पहनावे या रीति-रिवाजों का सम्मान करना ‘हिंदूकरण’ नहीं है, बल्कि यह भारत की साझी संस्कृति और विविधता की पहचान है। आदिवासी समाज हमेशा से ही समावेशी रहा है, और किसी भी सांस्कृतिक व्यवहार को अपनाना धर्मांतरण नहीं है।
उरांव ने डी-लिस्टिंग बिल पर केंद्र सरकार से तत्काल कार्रवाई की मांग करते हुए कहा कि, “बहुत सी मूल जनजातियाँ आज भी अपने अधिकारों से वंचित हैं, क्योंकि उन्हें या तो जबरन अनुसूचित जातियों में शामिल कर दिया गया या उनकी पहचान प्रशासनिक लापरवाही में गुम हो गई।” उन्होंने कहा कि डी-लिस्टिंग बिल इन समुदायों को उनका संवैधानिक हक दिलाने का प्रयास है।
सोमा उरांव के इस बयान ने न केवल राजनीतिक हलकों में चर्चा को जन्म दिया है, बल्कि आदिवासी युवाओं, शिक्षकों और समाजसेवियों के बीच एक नई बौद्धिक बहस भी छेड़ दी है। सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर लगातार प्रतिक्रियाएं आ रही हैं और आदिवासी युवाओं का एक वर्ग इसे अपनी पहचान की पुनर्स्थापना से जोड़ रहा है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह बहस आने वाले समय में आदिवासी राजनीति का नया विमर्श तय कर सकती है और आदिवासी अधिकारों की पुनः व्याख्या की शुरुआत मानी जा रही है।



